SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1711

1871 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विरूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣ग्निः꣢ प्र꣣त्ने꣢न꣣ ज꣡न्म꣢ना꣣ शु꣡म्भा꣢नस्त꣣न्वा३ꣳ स्वा꣢म् । क꣣वि꣡र्विप्रे꣢꣯ण वावृधे ॥१७११॥

अ꣣ग्निः꣢ । प्र꣣त्ने꣡न꣢ । ज꣡न्म꣢꣯ना । शु꣡म्भा꣢꣯नः । त꣣न्व꣢म् । स्वाम् । क꣣विः꣢ । वि꣡प्रे꣢꣯ण । वि । प्रे꣣ण । वावृधे ॥१७११॥

Mantra without Swara
अग्निः प्रत्नेन जन्मना शुम्भानस्तन्वा३ꣳ स्वाम् । कविर्विप्रेण वावृधे ॥

अग्निः । प्रत्नेन । जन्मना । शुम्भानः । तन्वम् । स्वाम् । कविः । विप्रेण । वि । प्रेण । वावृधे ॥१७११॥

Samveda - Mantra Number : 1711
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 1;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(प्रत्नेन जन्मना) पूर्व जन्मों के शुभ कर्मों के कारण (अग्निः) अग्नि रूप हुआ उपासक, (स्वां तन्वम्) अपने शरीर को (शुम्भमानः) सद्गुणों द्वारा सुशोभित करता हुआ, (कविः) और परमेश्वर के गुण कीर्तन करता हुआ, (विप्रेण) सर्वव्यापक-सर्वज्ञ परमेश्वर की कृपा से (वावृधे) खूब बढ़ता है ।
Footnote
[ अग्नि में जिस वस्तु को डाला जाय वह वस्तु भी अग्निमय हो जाती है, प्रकाशस्वरूप हो जाती है । इसी प्रकार जिस उपासक ने पूर्वजन्मों में, अपनी आत्मा को, अग्निस्वरूप अर्थात् प्रकाशस्वरूप परमेश्वर में, आहुतिरूप में, समर्पित कर दिया है, वह भी अग्निमय होकर, अर्थात् प्रकाशमय होकर, नया जन्म धारण करता अर्थात् तेजस्वी शरीर को धारण करता, तथा परमेश्वर के गुणों का कीर्तन करता है । वेद में गौणरूप में भी अग्नि शब्द का प्रयोग मनुष्य के सम्बन्ध में भी हुआ है । यथाः—“अभि प्र यन्तु नरो अग्निरूपाः” (ऋ० १०। ८४। १) विप्रेण = वि + प्रा (पूरणे), अर्थात् सर्वत्र पूर्ण, सर्वव्यापक । तथा विप्र = मेघावी (निघं० ३। १५) । प्रत्नेन जन्मना = पुनर्जन्म में प्रमाण ]