SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1707

1871 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣢ उ꣣ग्र꣡ इ꣢व शर्य꣣हा꣢ ति꣣ग्म꣡शृ꣢ङ्गो꣣ न꣡ वꣳस꣢꣯गः । अ꣢ग्ने꣣ पु꣡रो꣢ रु꣣रो꣡जि꣢थ ॥१७०७॥

यः꣢ । उ꣡ग्रः꣢ । इ꣣व । शर्यहा꣢ । श꣣र्य । हा꣢ । ति꣣ग्म꣡शृ꣢ङ्गः । ति꣣ग्म꣢ । शृ꣣ङ्गः । न꣡ । व꣡ꣳस꣢꣯गः । अ꣡ग्ने꣢꣯ । पु꣡रः꣢꣯ । रु꣣रो꣡जि꣢थ ॥१७०७॥

Mantra without Swara
य उग्र इव शर्यहा तिग्मशृङ्गो न वꣳसगः । अग्ने पुरो रुरोजिथ ॥

यः । उग्रः । इव । शर्यहा । शर्य । हा । तिग्मशृङ्गः । तिग्म । शृङ्गः । न । वꣳसगः । अग्ने । पुरः । रुरोजिथ ॥१७०७॥

Samveda - Mantra Number : 1707
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 4;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(यः) जो परमेश्वर (शर्यहा) मृत्युदण्ड के योग्य व्यक्तियों का हनन करता है, इस लिये वह (उग्र इव) उग्र व्यक्ति के सदृश प्रतीत होता है, जो परमेश्वर (तिग्मशृङ्गः) तीखी किरणों वाले सूर्य के (न) सदृश कुकर्मियों के ताप-सन्ताप देता है, फिर भी उस की यह (वंसगः) गतिविधि श्रद्धापूर्वक भजने-योग्य है—ऐसे (अग्ने) हे जगन्नेता ! आप उपासकों की (पुरः) शरीर-पुरियों को (रुरोजिथ) भंग कर, उन्हें मुक्ति प्रदान करते हैं ।
Footnote
[ शर्य = शृ [ हिंसायाम्, हिंसनीय । शृङ्ग = शृङ्गाणि ज्वलतो नाम (निघं० १। १७) । वंसगः = वननीय गतिः (सायण); वननीय = वन संभक्तौ, सम्यक् भक्तौ) । उग्र इव = परमेश्वर न्याय करने में उग्र के सदृश प्रतीत होता है, परन्तु वस्तुतः वह उग्र नहीं । न्याय भी व्यक्ति के सुधार के लिये है, व्यक्ति के विनाश या बदले की दृष्टि से नहीं ]