SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1692

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- कलिः प्रागाथः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
वृ꣡क꣢श्चिदस्य वार꣣ण꣡ उ꣢रा꣣म꣢थि꣣रा꣢ व꣣यु꣡ने꣢षु भूषति । से꣢꣫मं न꣣ स्तो꣡मं꣢ जुजुषा꣣ण꣢꣫ आ ग꣣ही꣢न्द्र꣣ प्र꣢ चि꣣त्र꣡या꣢ धि꣣या꣢ ॥१६९२॥

वृ꣡कः꣢꣯ । चि꣣त् । अस्य । वारणः꣢ । उ꣣राम꣡थिः꣢ । उ꣣रा । म꣡थिः꣢꣯ । आ । व꣣यु꣡ने꣢षु । भू꣣षति । सा꣢ । इ꣣म꣢म् । नः꣣ । स्तो꣡म꣢꣯म् । जु꣣जुषाणः꣢ । आ । ग꣣हि । इ꣡न्द्र꣢꣯ । प्र । चि꣣त्र꣡या । धि꣣या꣢ ॥१६९२॥

Mantra without Swara
वृकश्चिदस्य वारण उरामथिरा वयुनेषु भूषति । सेमं न स्तोमं जुजुषाण आ गहीन्द्र प्र चित्रया धिया ॥

वृकः । चित् । अस्य । वारणः । उरामथिः । उरा । मथिः । आ । वयुनेषु । भूषति । सा । इमम् । नः । स्तोमम् । जुजुषाणः । आ । गहि । इन्द्र । प्र । चित्रया । धिया ॥१६९२॥

Samveda - Mantra Number : 1692
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 3;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(अस्य) इस परमेश्वर के उपदिष्ट (वयुनेषु) सत्यज्ञानों के प्राप्त हो जाने पर, (वृकः चित्) भेड़िये के से स्वभाव वाला हिंस्र व्यक्ति भी, (उरामथिः) और बहुत दुःखदायी व्यक्ति भी, (वारणः) अपने हिंस्र और दुःखदायी स्वभावों का निवारण कर देता है, (आ भूषति) इस प्रकार अपनी शोभा बढ़ा लेता है । (इन्द्र) है परमेश्वर ! (सः) वह-आप (नः) हमारी (इमम्) इस सम्मिलित (स्तोमम्) स्तुति-तथा-सामगान का (जुजुषाणः) प्रीतिपूर्वक सेवन करते हुए, और हमें (चित्रया) अद्भुत (धिया) बुद्धि प्रदान करते हुए, (प्र) शीघ्र (आ गहि) हमारे हृदयों में प्रकट हूजिये ।
Footnote
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