SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1679

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अम्बरीषो वार्षागिर ऋजिश्वा भारद्वाजश्च Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा꣢य सोम꣣ पा꣡त꣢वे वृत्र꣣घ्ने꣡ परि꣢꣯ षिच्यसे । न꣡रे꣢ च꣣ द꣡क्षि꣢णावते वी꣣रा꣡य꣢ सदना꣣स꣡दे꣢ ॥१६७९॥

इ꣡न्द्रा꣢꣯य । सो꣣म । पा꣡त꣢꣯वे । वृ꣣त्रघ्ने꣡ । वृ꣣त्र । घ्ने꣣ । प꣡रि꣢꣯ । सि꣣च्यसे । न꣡रे꣢꣯ । च꣣ । द꣡क्षि꣢꣯णावते । वी꣣रा꣡य꣣ । स꣣दनास꣡दे꣢ । स꣣दन । स꣡दे꣢꣯ ॥१६७९॥

Mantra without Swara
इन्द्राय सोम पातवे वृत्रघ्ने परि षिच्यसे । नरे च दक्षिणावते वीराय सदनासदे ॥

इन्द्राय । सोम । पातवे । वृत्रघ्ने । वृत्र । घ्ने । परि । सिच्यसे । नरे । च । दक्षिणावते । वीराय । सदनासदे । सदन । सदे ॥१६७९॥

Samveda - Mantra Number : 1679
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(सोम) हे सौम्य उपासक ! (पातवे) रक्षा के लिये तू (इन्द्राय) परमेश्वर के प्रति (परिषिच्यसे) पूर्णरूप में न्योछावर कर दिया गया है, उस परमेश्वर के प्रति जोकि (वृन्नध्ने) तेरे पाप-वृत्रों की हत्या करता, (नरे) जगत् का नेता है, (दक्षिणावते) जिसने समय पदार्थ मानो दक्षिणारूप में दे रखे हैं, (वीराय) जो सर्वप्रेरक हैं, (सदनासदे) और तेरे हृदय सदन में विराज रहा है।
Footnote
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