SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1676

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इ꣣मे꣡ हि ते꣢꣯ ब्रह्म꣣कृ꣡तः꣢ सु꣣ते꣢꣫ सचा꣣ म꣢धौ꣣ न꣢꣫ मक्ष आ꣡स꣢ते । इ꣢न्द्रे꣣ का꣡मं꣢ जरि꣣ता꣡रो꣢ वसू꣣य꣢वो꣣ र꣢थे꣣ न꣢꣫ पाद꣣मा꣡ द꣢धुः ॥१६७६॥

इ꣣मे꣢ । हि । ते꣣ । ब्रह्मकृ꣡तः꣢ । ब्र꣣ह्म । कृ꣡तः꣢꣯ । सु꣣ते꣢ । स꣡चा꣢꣯ । म꣡धौ꣢꣯ । न । म꣡क्षः꣢꣯ । आ꣡स꣢꣯ते । इ꣡न्द्रे꣢꣯ । का꣡म꣢꣯म् । ज꣣रिता꣡रः꣢ । व꣣सूय꣡वः꣢ । र꣡थे꣢꣯ । न । पा꣡द꣢꣯म् । आ । द꣣धुः ॥१६७६॥

Mantra without Swara
इमे हि ते ब्रह्मकृतः सुते सचा मधौ न मक्ष आसते । इन्द्रे कामं जरितारो वसूयवो रथे न पादमा दधुः ॥

इमे । हि । ते । ब्रह्मकृतः । ब्रह्म । कृतः । सुते । सचा । मधौ । न । मक्षः । आसते । इन्द्रे । कामम् । जरितारः । वसूयवः । रथे । न । पादम् । आ । दधुः ॥१६७६॥

Samveda - Mantra Number : 1676
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(ब्रह्मकृतः) जिन्होंने आप-ब्रह्म को अपना लिया है, ऐसे (ते) आप के (इमे) ये उपासक, (सुते) भक्तिरस के उत्पन्न हो जाने पर, (सचा) आप के साथ लीन हुए, (आसते) ऐसे उपासना में बैठते हैं, (न) जैसे कि (मधौ) मधुभरे छत्ते पर (मक्षः) मधुमक्खियाँ मधु में लीन हुई सी बैठती हैं । (वसूयवः) आप की आनन्द-रस रूपी सम्पत्ति के अभिलाषी (जरितारः) ये स्तोता लोग, (इन्द्र) आप परमेश्वर में, (कामम्) अपनी सब कामनाओं का (आ दधुः) आधान कर निश्चिन्त हो जाते है, (न) जैसे कि रथारोही, (पादम्) पैरों समेत अपने-आप को, (रथे) रथ में, (आ दधुः) सुरक्षित रूप में रख कर, निश्चिन्त हो जाते हैं ।
Footnote
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