SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1670

1871 Mantra
Devata- विष्णुः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्री꣡णि꣢ प꣣दा꣡ वि च꣢꣯क्रमे꣣ वि꣡ष्णु꣢र्गो꣣पा꣡ अदा꣢꣯भ्यः । अ꣢तो꣣ ध꣡र्मा꣢णि धा꣣र꣡य꣢न् ॥१६७०॥

त्री꣡णि꣢꣯ । प꣣दा꣢ । वि । च꣣क्रमे । वि꣡ष्णुः꣢꣯ । गो꣣पाः꣢ । गो꣣ । पाः꣢ । अ꣡दा꣢꣯भ्यः । अ । दा꣣भ्यः । अ꣡तः꣢꣯ । ध꣡र्मा꣢꣯णि । धा꣣र꣡य꣢न् ॥१६७०॥

Mantra without Swara
त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन् ॥

त्रीणि । पदा । वि । चक्रमे । विष्णुः । गोपाः । गो । पाः । अदाभ्यः । अ । दाभ्यः । अतः । धर्माणि । धारयन् ॥१६७०॥

Samveda - Mantra Number : 1670
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(विष्णुः) व्यापक परमेश्वर ने (त्रीणि पदा) तीन-पादों का भी (विचक्रमे) पराक्रम दर्शाया है । अतः इन तीन पादों से वह (धर्माणि) धारण करने वाले तीनों लोकों को (धारयन्) धारण कर रहा हैं । परमेश्वर इन तीन-पादों की दृष्टि से (गोपाः) गुप्त रूप है, अप्रकटित रूप है, (अदाभ्यः) वह सदा इस रूप में रहता है, यह रूप इसका सांसारिक परिवर्तनों से सम्बद्ध है ।
Footnote
[ विचक्रमे = संसारोत्पत्ति के आरम्भ में परमेश्वर “ईक्षण” करता है “स ऐक्षत” (छान्दोग्य उप०), कि मैं नानाविध जगत् का निर्माण करू “बहु स्याम प्रजायेय” (छान्दोग्य उप०) । यह “ईक्षण” और “बहु स्याम” की इच्छा जगत् का प्रारम्भिक बीज है । इन्हीं द्वारा जगत् की रचना और धारणा होती है । यह बीज “त्रिपाद् परमेश्वर में प्रथम अङ्कुरित होता है, तत्पश्चात् सृष्टि रचना होती है” । मन्त्र १६६९ और १६७० की व्याख्या यजुर्वेद अध्याय ३१ के पुरुष सूक्त के “पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि” (३१। ३) के अनुसार की गई है । ]