SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1664

1871 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣡ नो꣢ म꣣हा꣡ꣳ अ꣢निमा꣣नो꣢ धू꣣म꣡के꣢तुः पुरुश्च꣣न्द्रः꣢ । धि꣣ये꣡ वाजा꣢꣯य हिन्वतु ॥१६६४॥

सः꣢ । नः꣣ । महा꣢न् । अ꣣निमानः꣢ । अ꣣ । निमानः꣢ । धू꣣म꣡के꣢तुः । धू꣣म꣢ । के꣣तुः । पु꣣रुश्चन्द्रः । पु꣣रु । चन्द्रः꣢ । धि꣣ये꣢ । वा꣡जा꣢꣯य । हि꣡न्वतु ॥१६६४॥

Mantra without Swara
स नो महाꣳ अनिमानो धूमकेतुः पुरुश्चन्द्रः । धिये वाजाय हिन्वतु ॥

सः । नः । महान् । अनिमानः । अ । निमानः । धूमकेतुः । धूम । केतुः । पुरुश्चन्द्रः । पुरु । चन्द्रः । धिये । वाजाय । हिन्वतु ॥१६६४॥

Samveda - Mantra Number : 1664
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 1;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(महान्) महान्, (अनिमानः) माप रहित, (धूमकेतुः) धुआं जिसका ज्ञापक चिन्ह है, (पुरुश्चन्द्रः) पूर्ण-चांद भी जिसका ज्ञापक चिन्ह है, (सः) वह परमेश्वर, (नः) हमें (धिये) सद्बुद्धि और सत्कर्मों के लिये, तथा (बाजाय) शक्ति की प्राप्ति के लिये (हिन्वतु) प्रेरित करे ।
Footnote
[ मन्त्र में “धूम और चन्द्र” पद आध्यात्मिक धूम और चन्द्र के सूचक हैं । श्वेताश्वतर उपनिषद् (अ० २, खं ११) में कहा है कि “नीहारधूमार्कानिलानलानां खद्योत विद्युत्स्फटिक शशीनाम्। एतानि रूपाणि पुरः सराणि ब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगे”। अर्थात् योगाभ्यास में सफेद कोहरा, धूम, सूर्य, वायु का चलना, आग, जुगनुओं या सितारों, विद्युत्, स्फटिक, और चांद आदि का आंतरिक-भान होना, ब्रह्माभिव्यक्ति के पूर्व रूप हैं। इन में “धूम और चान्द” की भी गणना हुई है, जिन का कि वर्णन १६६४ वें मन्त्र में हुआ है । धिये = धी (प्रज्ञा और कर्म) । पुरुश्चन्द्रः पुरुश्चासौ चन्द्रश्च (सायण)। (पुरुः पूर्णः) चन्द्र: ज्ञापको यस्य सः ]