SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1662

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡रं꣢ त इन्द्र कु꣣क्ष꣢ये꣣ सो꣡मो꣢ भवतु वृत्रहन् । अ꣢रं꣣ धा꣡म꣢भ्य꣣ इ꣡न्द꣢वः ॥१६६२॥

अ꣡र꣢꣯म् । ते꣣ । इन्द्र । कु꣡क्षये꣢ । सो꣡मः꣢꣯ । भ꣣वतु । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । अ꣡र꣢꣯म् । धा꣡म꣢꣯भ्यः । इ꣡न्द꣢꣯वः ॥१६६२॥

Mantra without Swara
अरं त इन्द्र कुक्षये सोमो भवतु वृत्रहन् । अरं धामभ्य इन्दवः ॥

अरम् । ते । इन्द्र । कुक्षये । सोमः । भवतु । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । अरम् । धामभ्यः । इन्दवः ॥१६६२॥

Samveda - Mantra Number : 1662
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 1;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(वृत्रहन्) हे पापों के घेरे का विनाश करने वाले (इन्द्र) परमेश्वर ! (सोमः) समग्र उत्पन्न-ब्रह्माण्ड, (ते) आपके (कुक्षये) केवल अल्प-निवासगृह के वर्णन के निमित्त (अरम् भवत) पर्याप्त है, और (इन्दवः) चन्द्रसमशीतल स्वभाव वाले उपासक (ते धामभ्यः) आपके अन्य धामों के कथन के लिये (अरम्, अलम्) पर्याप्त हैं ।
Footnote
[ वृत्रहन् = वृत्रस्य आबरकस्य पापस्य (सायण) । सोमः = उत्पन्न ब्रह्माण्ड (षु प्रसव) । कक्ष = कु (अल्प) + क्षय (निवास गृह) । यह समग्र ब्रह्माण्ड परमेश्वर के निवास के लिये अत्यल्प है । इसमें तो केवल एक पाद ही, परमेश्वर का, समाया हुआ है (पादोऽस्य विश्वा भूतानि, यजु० ३१। ३) । इस परमेश्वर के शेष तीन पाद संसार की रचना, पालना और संहार से ऊपर उठे हुए हैं, संसार से असम्बन्धित हैं । “त्रिपादस्यामृतं दिवि”, तथा “त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः” (यजु० ३१। ३,४) । परमेश्वर के इन तीन पादों का वर्णन तो प्रत्यक्षदर्शी योगिजन ही कर सकते हैं । यह ब्रह्माण्ड परमेश्वर का एक-धाम हैं । शेष त्रिपाद, परमेश्वर के अन्य तीन-धाम हैं । ब्रह्माण्ड अर्थात् जगत् जागरितावस्थारूप है, प्रलयोन्मुखता स्वप्न रूप है, पूर्ण प्रलय सुषुप्त्यवस्था, तथा जगत् विहीनावस्था तुर्य रूप है ]*
*मनुस्मृति में प्रलयोन्मुखावस्था को “सुप्त अवस्था”, तथा पूर्ण प्रलय को “प्रसुप्त अवस्था” कहा है । यथाः—“आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः” । स्वप्न अवस्था = सुप्त अवस्था; तथा सुषुप्तिअवस्था = प्रसुप्त अवस्था ॥