SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1661

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वि꣣व्य꣡क्थ꣢ महि꣣ना꣡ वृ꣢षन्भ꣣क्ष꣡ꣳ सोम꣢꣯स्य जागृवे । य꣡ इ꣢न्द्र ज꣣ठ꣡रे꣢षु ते ॥१६६१॥

वि꣣व्य꣡क्थ꣢ । म꣣हिना꣢ । वृ꣣षन् । भक्ष꣢म् । सो꣡म꣢꣯स्य । जा꣣गृवे । यः꣢ । इ꣣न्द्र । जठ꣡रे꣢षु । ते꣣ ॥१६६१॥

Mantra without Swara
विव्यक्थ महिना वृषन्भक्षꣳ सोमस्य जागृवे । य इन्द्र जठरेषु ते ॥

विव्यक्थ । महिना । वृषन् । भक्षम् । सोमस्य । जागृवे । यः । इन्द्र । जठरेषु । ते ॥१६६१॥

Samveda - Mantra Number : 1661
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 18; Khand » 1;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(वृषन्) हे सुख-शान्ति की वर्षा करने वाले !, (जागृवे) हे सदा जागरूक (इन्द्र) परमेश्वर ! आप अपनी (महिना) महिमा से, महत्त्वगुण से, (विव्यक्य) सर्वत्र व्याप रहे हैं, और आप अपनी महिमा से ही, (सोमस्य) उत्पन्न-संसार का (भक्षम्) भक्षण, प्रलयकाल में, करते हैं, (यः) जो उत्पन्न-संसार कि (ते) आपके (जठरेषु) पेटों में समा रहा है, और समा जाता है ।
Footnote
[ अथर्ववेद में विराट्-पुरुष का वर्णन करते हुए कहा है कि “अन्तरिक्षमुतोदरम्” (१०। ७। ३२), अर्थात् परमेश्वर का उदर है—अन्तरिक्ष । परमेश्वर के इस अन्तरिक्षरूपी पेट (जठर) में समग्र ब्रह्माण्ड समाया हुआ है, इसी अन्तरिक्ष-पेट में ही समग्र ब्रह्माण्ड प्रलय काल में समा जाता है । इसी भक्षण की दृष्टि से परमेश्वर को “अत्ता” और “अन्नाद” भी कहते हैं । मन्त्र में सोम का भक्षण कहा है. सोम का पान नहीं कहा । इसीलिये सोम का अर्थ “भक्तिरस” इस मन्त्र में अनुपपन्न है । “जठरेषु” में बहुवचन इस सच्चाई को सूचित करता है कि संसार का उत्पादन और संहार (भक्षण) बार-बार सृष्टिनियम द्वारा होता रहता है। संसार की उत्पत्ति, स्थिति, और प्रलय, — ये तीनों ही परमेश्वर के जठरों (अन्तरिक्षों) में होते रहते हैं । परमेश्वर के शरीर और शरीरावयवों का वर्णन काल्पनिक है (यजु० ३१। १०, १३; व्यकल्पयन्, तथा अकल्पयन्) ]