SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1656

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
नी꣢꣯व शी꣣र्षा꣡णि꣢ मृढ्वं꣣ म꣢ध्य꣣ आ꣡प꣢स्य तिष्ठति । शृ꣡ङ्गे꣢भिर्द꣣श꣡भि꣢र्दि꣣श꣢न् ॥१६५६

नि꣢ । इ꣣व । शीर्षा꣡णि꣢ । मृ꣣ढ्वम् । म꣡ध्ये꣢꣯ । आ꣡प꣢꣯स्य । ति꣣ष्ठति । शृ꣡ङ्गे꣢꣯भिः । द꣣श꣡भिः꣢ । दि꣣श꣢न् ॥१६५६॥

Mantra without Swara
नीव शीर्षाणि मृढ्वं मध्य आपस्य तिष्ठति । शृङ्गेभिर्दशभिर्दिशन् ॥१६५६

नि । इव । शीर्षाणि । मृढ्वम् । मध्ये । आपस्य । तिष्ठति । शृङ्गेभिः । दशभिः । दिशन् ॥१६५६॥

Samveda - Mantra Number : 1656
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 4;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
हे उपासको ! तुम अपने (शीर्षाणि) सिरों को (इव) मानो (नि मृढ्वम्) खूब मांज लो, अर्थात् अपने विचारों को खूब शुद्ध-पवित्र कर लो, क्योंकि परमेश्वर (आपस्य) प्राणों, रस-रक्तों के (मध्ये) बीच में (तिष्ठति) सदा स्थित है । वह तुम्हें (शृङ्गेभिः दशभिः) शृंगारमय दस विकारों के दुष्परिणामों द्वारा, (विशन्) जीवन का यथार्थ मार्ग दर्शा रहा है ।
Footnote
[ ब्रह्मचर्य योगसाधना का मुख्य उपाय है। योगदर्शन में “वीर्य” को भी समाधि का अंग माना है । यथाः—श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधि प्रज्ञापूर्वक इतरेषाम्” (१। २०) । ब्रह्मचर्य के लिये विचारों की पवित्रता आवश्यक है। विचारों की पवित्रता पर कर्मों की पवित्रता निर्भर है । शृंगारमय विकार जीवन को अपवित्र कर, व्यक्ति को योगसाधना से विमुख कर देते हैं । कामुकता से प्रेरित हो कर स्त्रीपुरुष का परस्पर संस्मरण, दर्शन, क्रीड़ा, एक दूसरे के रंग-रूप का कीर्तन, परस्पर भाषण, कामचेष्टा, कामभूषा, परस्पर प्रसंग अर्थात् मैथुन, कामुक साहित्य का पढ़ना, ये सब शृंगार-रस के परिणाम हैं । मन्त्र निर्देश करता है कि ये कामविकार, परिणामरूप में, दुःखदायी और योग विरोधी हैं। ]