SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1632

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- रेभसूनू काश्यपौ Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
त꣡म꣢स्य मर्जयामसि꣣ म꣢दो꣣ य꣡ इ꣢न्द्र꣣पा꣡त꣢मः । यं꣡ गाव꣢꣯ आ꣣स꣡भि꣢र्द꣣धुः꣢ पु꣣रा꣢ नू꣣नं꣡ च꣢ सू꣣र꣡यः꣢ ॥१६३२॥

तम् । अ꣣स्य । मर्जयामसि । म꣡दः꣢꣯ । यः । इ꣣न्द्रपा꣡त꣢मः । इ꣣न्द्र । पा꣡त꣢꣯मः । यम् । गा꣡वः꣢꣯ । आ꣣स꣡भिः꣢ । द꣣धुः꣢ । पु꣣रा꣢ । नू꣣न꣢म् । च꣣ । सूर꣡यः꣢ ॥१६३२॥

Mantra without Swara
तमस्य मर्जयामसि मदो य इन्द्रपातमः । यं गाव आसभिर्दधुः पुरा नूनं च सूरयः ॥

तम् । अस्य । मर्जयामसि । मदः । यः । इन्द्रपातमः । इन्द्र । पातमः । यम् । गावः । आसभिः । दधुः । पुरा । नूनम् । च । सूरयः ॥१६३२॥

Samveda - Mantra Number : 1632
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(अस्य) इस उपासक के (तम्) उस भक्तिरस को, हम गुरुजन, (मर्जयामसि) परिमार्जन द्वारा विशुद्ध करते हैं, (यः) जो भक्तिरस की (मदः) परमेवर की तृप्ति और हर्ष का उत्पादक हो जाय, और (इन्द्रपातमः) परमेश्वर को पूर्णतया स्वीकृत हो जाय, (गावः) स्तुतिगान करने वाले (सूरयः) स्तोता, (पुरा) पूर्व कालों में (च) ओर (नूनम्) अब भी (यम्) जिस भक्तिरस को (आसभिः) मौखिक स्तुतियों और सामगानों द्वारा (दधु) परिपुष्ट करते रहे हैं, और अब भी परिपुष्ट करते हैं ।
Footnote
[ केवल परमेश्वर की प्राप्ति के लिए प्रकट किया भक्तिरस “विशुद्ध” भक्तिरस है । इसमें सांसारिक-सम्पत्तियों की प्राप्ति, प्रार्थित नहीं होती ]