SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1630

1871 Mantra
Devata- इन्द्रवायू Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
वा꣢य꣣वि꣡न्द्र꣢श्च शु꣣ष्मि꣡णा꣢ स꣣र꣡थ꣢ꣳ शवसस्पती । नि꣣यु꣡त्व꣢न्ता न ऊ꣣त꣢य꣣ आ꣡ या꣢तं꣣ सो꣡म꣢पीतये ॥१६३०॥

वा꣡यो꣢꣯ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । च꣣ । शुष्मि꣡णा꣢ । स꣣र꣡थ꣢म् । स꣣ । र꣡थ꣢꣯म् । श꣣वसः । पतीइ꣡ति꣢ । नि꣣यु꣡त्व꣢न्ता । नि꣣ । यु꣡त्व꣢꣯न्ता । नः꣣ । ऊत꣡ये꣢ । आ । या꣣तम् । सो꣡म꣢꣯पीतये । सो꣡म꣢꣯ । पी꣣तये ॥१६३०॥

Mantra without Swara
वायविन्द्रश्च शुष्मिणा सरथꣳ शवसस्पती । नियुत्वन्ता न ऊतय आ यातं सोमपीतये ॥

वायो । इन्द्रः । च । शुष्मिणा । सरथम् । स । रथम् । शवसः । पतीइति । नियुत्वन्ता । नि । युत्वन्ता । नः । ऊतये । आ । यातम् । सोमपीतये । सोम । पीतये ॥१६३०॥

Samveda - Mantra Number : 1630
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(वायो) हे सर्वगत प्राणाधार ! आप, (च) और (इन्द्रः) आप का ऐश्वर्यवान् स्वरूप अर्थात् आप के ये दोनों स्वरूप, (सरथम्) साथ-साथ रहते हुए (शुष्मिणा) सबल और (शवसस्पती) बलों के स्वामी होते हैं । हे परमेश्वर ! (ऊतये) हमारी रक्षा के लिये, और (सोमपीतये) हमारे भक्तिरसों के पान के लिये आप इन दोनों स्वरूपों में (नियुत्वता) तथा अपने हजारों रूपों के साथ, (आ यातम्) प्रकट हूजिये ।
Footnote
[ सरथम् = एक रथ में, अर्थात् साथ-साथ । एक रथ के सवार साथ-साथ रहते हैं । परमात्मा वायुरूप तो है, अर्थात् सर्वत्र व्यापक तो है, इस दृष्टि से कहीं भी बैठे उपासक भक्तिरस का ग्रहण वह कर सकता है, परन्तु यदि फलदान में वह अशक्त है, अनीश्वर है, अर्थात् “इन्द्ररूप” नहीं तो भक्त की उपासना निष्फल हो जायगी । और यदि परमात्मा इन्द्र हैं, अधीश्वरी शक्ति से सम्पन्न है, अर्थात् फलदान में समर्थ है, परन्तु वह वायुरूप नहीं, अर्थात् सर्वगत नहीं तब भी वह सभी उपासकों के भक्तिरसों का ग्रहण नहीं कर सकेगा । क्योंकि वहां उस की सत्ता ही नहीं, वहाँ के भक्तों तक वह पहुंच ही नहीं सकता । इसलिये उपासक की सफलता के लिये उपासक, परमेश्वर के दोनों स्वरूपों का आह्वान एक साथ करता है । इस भाव को द्योतित करने के लिये मन्त्र में “सरथम्” पद है ।
[ वायो = वा (गतौ), वा गतिगन्धनयोः । गति अर्थात् सर्वगत परमेश्वर ]
[घा० १६ । उ० १ । स्व० २ ]