SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1629

1871 Mantra
Devata- इन्द्रवायू Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्र꣢श्च वायवेषा꣣ꣳ सो꣡मा꣢नां पी꣣ति꣡म꣢र्हथः । यु꣣वा꣡ꣳ हि यन्तीन्द꣢꣯वो नि꣣म्न꣢꣫मापो꣣ न꣢ स꣣꣬ध्र्य꣢꣯क् ॥१६२९॥

इ꣡न्द्रः꣢꣯ । च꣣ । वा꣡यो꣢꣯ । एषाम् । सो꣡मा꣢꣯नाम् । पी꣣ति꣢म् । अ꣣र्हथः । युवा꣢म् । हि । य꣡न्ति꣢꣯ । इ꣡न्द꣢꣯वः । नि꣣म्न꣢म् । आ꣡पः꣢꣯ । न । स꣣꣬ध्र्य꣢क् । स꣣ । ध्र्य꣣꣬क् ॥१६२९॥

Mantra without Swara
इन्द्रश्च वायवेषाꣳ सोमानां पीतिमर्हथः । युवाꣳ हि यन्तीन्दवो निम्नमापो न सध्र्यक् ॥

इन्द्रः । च । वायो । एषाम् । सोमानाम् । पीतिम् । अर्हथः । युवाम् । हि । यन्ति । इन्दवः । निम्नम् । आपः । न । सध्र्यक् । स । ध्र्यक् ॥१६२९॥

Samveda - Mantra Number : 1629
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(वायो) हे सर्वगत प्राणाधार ! आप (च) और (इन्द्रः) आप का परमैश्वर्यवान् स्वरूप ! अर्थात् आप के ये दोनों स्वरूप, (एषाम्) इन (सोमानाम्) भक्तिरसों के (पीतिम्) पान के (अर्हथः) योग्य हैं, (युवां हि) आप के इन दोनों स्वरूपों के प्रति (इन्दवः) हमारे भक्तिरस (यन्ति) पहुंचते हैं, (न) जैसे कि (आपः) जल (सध्रयक्) साथ-साथ मिल कर चलते हुए (निम्नम्) नीचे स्थान समुद्र की ओर पहुंचते हैं ।
Footnote
[ मन्त्रों के अर्थ प्रायः तीन प्रकार के होते हैं, आध्यात्मिक, आधिदैविक, और आधिभौतिक । आधिदैविक दृष्टि में वायु और सूर्य मिल कर, आकाश में, जल का ग्रहण करते हैं, जिस से वर्षा हो कर, नदियां समुद्र की ओर बहती हैं । आध्यात्मिक दृष्टि में वायु है प्राणाधार, तथा इन्द्र है परमैश्वर्यवान् । परमात्मा के ये दो स्वरूप मिल कर भक्तिरस का ग्रहण करते हैं । आधिभौतिक दृष्टि में वायु है वैश्य, और इन्द्र है राजा । वैश्य का धन और राजा की प्रबन्ध शक्ति, मिल कर, राज्यभार का वहन करते हैं ]