SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1625

1871 Mantra
Devata- विष्णुः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
कि꣡मित्ते꣢꣯ विष्णो परि꣣च꣢क्षि꣣ ना꣢म꣣ प्र꣡ यद्व꣢꣯व꣣क्षे꣡ शि꣢पिवि꣣ष्टो꣡ अ꣢स्मि । मा꣡ वर्पो꣢꣯ अ꣣स्म꣡दप꣢꣯ गूह ए꣣त꣢꣫द्यद꣣न्य꣡रू꣢पः समि꣣थे꣢ ब꣣भू꣡थ꣢ ॥१६२५॥

कि꣢म् । इत् । ते꣣ । विष्णो । परिच꣡क्षि꣢ । प꣣रि । च꣡क्षि꣢꣯ । ना꣡म꣢꣯ । प्र । यत् । व꣡वक्षे꣢꣯ । शि꣡पिविष्टः꣢ । शि꣢पि । विष्टः꣢ । अ꣣स्मि । मा꣡ । व꣡र्पः꣢꣯ । अ꣣स्म꣢त् । अ꣡प꣢꣯ । गू꣣हः । एत꣢त् । यत् । अ꣣न्य꣡रू꣢पः । अ꣣न्य꣢ । रू꣣पः । समिथे꣢ । स꣣म् । इथे꣢ । ब꣣भू꣡थ꣢ ॥१६२५॥

Mantra without Swara
किमित्ते विष्णो परिचक्षि नाम प्र यद्ववक्षे शिपिविष्टो अस्मि । मा वर्पो अस्मदप गूह एतद्यदन्यरूपः समिथे बभूथ ॥

किम् । इत् । ते । विष्णो । परिचक्षि । परि । चक्षि । नाम । प्र । यत् । ववक्षे । शिपिविष्टः । शिपि । विष्टः । अस्मि । मा । वर्पः । अस्मत् । अप । गूहः । एतत् । यत् । अन्यरूपः । अन्य । रूपः । समिथे । सम् । इथे । बभूथ ॥१६२५॥

Samveda - Mantra Number : 1625
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 17; Khand » 1;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(विष्णो) हे सर्वत्र व्यापक परमेश्वर ! (ते) आप के (नाम) नाम का (किम् इत्) क्या (परिचक्षि) मैं सर्वत्र कथन करूँ, (यत्) जब कि आप ने स्वयम् (प्र ववक्षे) उद्घोषित किया कर दिया है कि (शिपिविष्टः अस्मि) “मैं शिपिविष्ट हूँ”, प्रकाशमयी किरणों से घिरा हुआ हूँ, ज्योतिर्मय हूं । आप अपने (एतत् वर्पः) इस रूप को (अस्मत्) हम से अब (मा अपगूह) न छिपाइये, (यद्) जैसे कि आप (समिथे) देवासुर संग्रामों में, अभी तक, (अन्यरूपः) ज्योतिर्मय रूप से भिन्नरूप वाले (बभूथ) रहे हैं, अर्थात् अप्रकट रूप रहे हैं ।
Footnote
[ उपासक अभी तक देवासुर संग्रामों में निज शक्ति के भरोसे लड़ता रहा, परन्तु उसे सफलता नहीं हुई । जब विष्णु ने अपना ज्योतिर्मयरूप प्रकट किया तब उपासक के आसुर शत्रु पराजित हुए, क्यों कि ये शत्रु, अज्ञानान्धकार के परिणाम थे । इस लिये उपासक परमेश्वर के प्रति विनय भाव से कहता है कि आप इस ज्योतिर्मय स्वरूप को अब हम से छिपाईयेगा नहीं ।
[ शिपिविष्टः = शिपयो रश्मयः, तैराविष्टः प्रतिपन्नरश्मिः (निरु० ५। २। ८) ]