SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1615

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अत्रिर्भौमः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
वि꣣पश्चि꣢ते꣣ प꣡व꣢मानाय गायत म꣣ही꣡ न धारात्यन्धो꣢꣯ अर्षति । अ꣢हि꣣र्न꣢ जू꣣र्णा꣡मति꣢꣯ सर्पति꣣ त्व꣢च꣣म꣢त्यो꣣ न꣡ क्रीड꣢꣯न्नसर꣣द्वृ꣢षा꣣ ह꣡रिः꣢ ॥१६१५॥

वि꣣पश्चि꣡ते꣢ । वि꣣पः । चि꣡ते꣢꣯ । प꣡व꣢꣯मानाय । गा꣣यत । मही꣢ । न । धा꣡रा꣢꣯ । अ꣡ति꣢꣯ । अ꣡न्धः꣢꣯ । अ꣣र्षति । अ꣡हिः꣢꣯ । न । जू꣣र्णा꣢म् । अ꣡ति꣢꣯ । स꣣र्पति । त्व꣡च꣢꣯म् । अ꣡त्यः꣢꣯ । न । क्री꣡ड꣢꣯न् । अ꣣सरत् । वृ꣡षा꣢꣯ । ह꣡रिः꣢꣯ ॥१६१५॥

Mantra without Swara
विपश्चिते पवमानाय गायत मही न धारात्यन्धो अर्षति । अहिर्न जूर्णामति सर्पति त्वचमत्यो न क्रीडन्नसरद्वृषा हरिः ॥

विपश्चिते । विपः । चिते । पवमानाय । गायत । मही । न । धारा । अति । अन्धः । अर्षति । अहिः । न । जूर्णाम् । अति । सर्पति । त्वचम् । अत्यः । न । क्रीडन् । असरत् । वृषा । हरिः ॥१६१५॥

Samveda - Mantra Number : 1615
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 4;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
हे उपासको ! (विपश्चिते) मेधावी तथा (पवमानाय) पवित्र करने वाले परमेश्वर के लिये (गायत) सामगान किया करो । (न) जैसे (मही) पृथिवी सब को (अन्धः) अन्न (अति अर्षति) बहुमात्रा में प्राप्त कराती हैं, वैसे (धारा) परमेश्वर की आनन्दरसमयी धारा बहुमात्रा में सब को प्राप्त हो रही है । (न) जैसे (अहिः) सांप अपनी (जूर्णाम्) जीर्ण-शीर्ण (त्वचम्) कांचली को (अति) छोड़कर (सर्पति) निकल जाता है, वैसे (वृषा) सृष्टिकाल में सुखों की वर्षा करने वाला परमेश्वर, (हरिः) प्रलय काल में जगत् का संहार और परिहार कर, (असरत्) जगत् से बाहिर सरक जाता है। मानो वह (अत्यः) अश्व के (न) सदृश (क्रीडन्) क्रीड़ा-सी कर रहा है ।
Footnote
[ अश्व कभी रथ में जुतता, और कभी रथ से विमुक्त हो जाता है । ये स्थितियां अश्व की बार-बार होती हैं । इसी प्रकार सृष्टि और प्रलय भी बार-बार होते हैं ]