SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1604

1871 Mantra
Devata- अग्निर्हवींषि वा Rishi- हर्यतः प्रागाथः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
सि꣣ञ्च꣡न्ति꣢ न꣡म꣢साव꣣ट꣢मु꣣च्चा꣡च꣢क्रं꣣ प꣡रि꣢ज्मानम् । नी꣣ची꣡न꣢वार꣣म꣡क्षि꣢तम् ॥१६०४॥

सि꣣ञ्च꣡न्ति꣢ । न꣡म꣢꣯सा । अ꣣वट꣢म् । उ꣣च्चा꣡च꣢क्रम् । उ꣣च्चा꣢ । च꣣क्रम् । प꣡रि꣢꣯ज्मानम् । प꣡रि꣢꣯ । ज्मा꣣नम् । नीची꣡न꣢वारम् । नी꣣ची꣡न꣢ । वा꣣रम् । अ꣡क्षि꣢꣯तम् । अ । क्षि꣣तम् ॥१६०४॥

Mantra without Swara
सिञ्चन्ति नमसावटमुच्चाचक्रं परिज्मानम् । नीचीनवारमक्षितम् ॥

सिञ्चन्ति । नमसा । अवटम् । उच्चाचक्रम् । उच्चा । चक्रम् । परिज्मानम् । परि । ज्मानम् । नीचीनवारम् । नीचीन । वारम् । अक्षितम् । अ । क्षितम् ॥१६०४॥

Samveda - Mantra Number : 1604
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 3;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(अवटम्) इस अवट में स्थित ब्रह्म को, उपासकध्यानी, (नमसा) नमस्कारों की वर्षा द्वारा (सिञ्चन्ति) सींचते हैं। इस अवट में (उच्चाचक्रम्) सहस्रारचक्र ऊँचा स्थित है, (परिज्मानम्) जिस की कि प्रेरणाएँ शरीर में सब और गति करती हैं । (नीचीनवारम्) इस अवट के निचले भाग में एक द्वार है । (अक्षितम्) इस अवट के नीचे की ओर सुषुम्णा रूपी अक्ष अर्थात् धुरा चली गई है ।
Footnote
[ मन्त्र में “अवट” शब्द द्वारा सिर, और सिर में स्थित ब्रह्म का भी वर्णन हुआ है । जैसे कि “मञ्चाः क्रोशन्ति” वाक्य में “मञ्च” का अर्थ मञ्च भी है, और मञ्चस्थ पुरुष भी । “तिर्यग्बिलः चमसः ऊर्ध्वबुघ्नः, तस्मिन् यशो निहितं विश्वरूपम्” (अथर्व० १०। ८। ९) में इसी “अवट” का वर्णन है, ऊपर की खोपड़ी या मस्तिष्क के ऊपर की ओर के उभार को “ऊर्ध्वबुध्नः” कहा है। इस के नीचे की ओर जो बिल अर्थात् छिद्र है उसे “तिर्यग् बिलः” द्वारा सूचित किया है । इस बिल में से हो कर सुषुम्णा नाड़ी नीचे गुदा तक चली गई है । अक्षितम् = अक्षः जातः अस्य तत्; यथा “तारकितं नभः” । ब्रह्मसाक्षात्कार प्रथम हृदय में होता है, तत्पश्चात् सहस्रार चक्र में । तदनन्तर मुक्ति होती है ]