SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1603

1871 Mantra
Devata- अग्निर्हवींषि वा Rishi- हर्यतः प्रागाथः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣भ्या꣢र꣣मि꣡दद्र꣢꣯यो꣣ नि꣡षि꣢क्तं꣣ पु꣡ष्क꣢रे꣣ म꣡धु꣢ । अ꣣व꣡ट꣢स्य वि꣣स꣡र्ज꣢ने ॥१६०३॥

अ꣣भ्या꣡र꣢म् । अ꣣भि । आ꣡र꣢꣯म् । इत् । अ꣡द्र꣢꣯यः । अ । द्र꣣यः । नि꣡षि꣢꣯क्तम् । नि । सि꣣क्तम् । पु꣡ष्क꣢꣯रे । म꣡धु꣢꣯ । अ꣣वट꣡स्य꣢ । वि꣣स꣡र्ज꣢ने । वि꣣ । स꣡र्ज꣢꣯ने ॥१६०३॥

Mantra without Swara
अभ्यारमिदद्रयो निषिक्तं पुष्करे मधु । अवटस्य विसर्जने ॥

अभ्यारम् । अभि । आरम् । इत् । अद्रयः । अ । द्रयः । निषिक्तम् । नि । सिक्तम् । पुष्करे । मधु । अवटस्य । विसर्जने । वि । सर्जने ॥१६०३॥

Samveda - Mantra Number : 1603
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 3;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(अद्रयः) पर्वतों के सदृश अपने व्रतों में सुदृढ़ है उपासको !, (अवटस्य) सिर के गढ़े को (विसर्जने) त्याग करते समय, (पुष्करे) शरीर के पोषक हृदयकमल में (निषिक्तम्) सिञ्चित हुए (मधु) मधुर आनन्दरसमय प्रभु को, (अभि) साक्षात् रूप में, (आरम् इत्) मैं उपासक ने पा ही लिया है ।
Footnote
[ अवट का अर्थ है, गढ़ा । अव अटतीति अवटः, जो कि नीचे की ओर गया हुआ हो । सिर की खोपड़ी जो कि उल्टे रखे प्याले के सदश है, उसे मन्त्र में “अवट” कहा है । मोक्षावस्था में जीवात्मा इस खोपड़ी में स्थित मस्तिष्क के “ब्रह्मरन्ध्र अर्थात् सूर्यद्वार” द्वारा शरीर का परित्याग करता है “सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः सः पुरुषो ह्यव्ययात्मा” (मुण्डक १। २। ११) । इस अवट को छोड़ने से पूर्व ब्रह्म का साक्षात्कार होना आवश्यक है, जो ब्रह्म कि हृदय-पुष्कर में विराजमान हो रहा होता है “हृदि ह्येष आत्मा” (प्रश्न० ३। ६) । इस हृदय-पुष्कर में मधुर आनन्दरसरूप परमेश्वर का साक्षात्कार होता है । तदनन्तर मस्तिष्क में स्थित सहस्रार-चक्र में ब्रह्म को दिव्यज्योति प्रकट होती है, और मोक्ष होता है ]