SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1589

1871 Mantra
Devata- विश्वकर्मा Rishi- विश्वकर्मा भौवनः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वि꣡श्व꣢कर्मन्ह꣣वि꣡षा꣢ वावृधा꣣नः꣢ स्व꣣यं꣡ य꣢जस्व त꣣न्व꣢३ꣳ स्वा꣡ हि ते꣢꣯ । मु꣡ह्य꣢न्त्व꣣न्ये꣢ अ꣣भि꣢तो꣣ ज꣡ना꣢स इ꣣हा꣡स्माकं꣢꣯ म꣣घ꣡वा꣢ सू꣣रि꣡र꣢स्तु ॥१५८९॥

वि꣡श्व꣢꣯कर्मन् । वि꣡श्व꣢꣯ । क꣣र्मन् । हवि꣡षा꣢ । वा꣣वृधानः꣢ । स्व꣣य꣢म् । य꣣जस्व । तन्व꣢म् । स्वा । हि । ते꣣ । मु꣡ह्य꣢꣯न्तु । अ꣣न्ये꣢ । अ꣣न् । ये꣢ । अ꣣भि꣡तः꣢ । ज꣡ना꣢꣯सः । इ꣣ह꣢ । अ꣣स्मा꣡क꣢म् । म꣣घ꣡वा꣢ । सू꣡रिः꣢꣯ । अ꣣स्तु ॥१५८९॥

Mantra without Swara
विश्वकर्मन्हविषा वावृधानः स्वयं यजस्व तन्व३ꣳ स्वा हि ते । मुह्यन्त्वन्ये अभितो जनास इहास्माकं मघवा सूरिरस्तु ॥

विश्वकर्मन् । विश्व । कर्मन् । हविषा । वावृधानः । स्वयम् । यजस्व । तन्वम् । स्वा । हि । ते । मुह्यन्तु । अन्ये । अन् । ये । अभितः । जनासः । इह । अस्माकम् । मघवा । सूरिः । अस्तु ॥१५८९॥

Samveda - Mantra Number : 1589
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(विश्वकर्मन्) हे विश्वकर्त्ता ! (हविषा) हम उपासकों की आत्मसमर्पणरूपी हवियों द्वारा (वावृधानः) अधिकाधिक प्रसन्न हुए आप (स्वयम्) स्वयं (तन्वम्) हमारी तनुओं अर्थात् देहों को (यजस्व) यज्ञमय कर दीजिये, (हि) क्योंकि निश्चय से, हमारी यह तनुएँ (ते) आप की (स्वा) अपनी बन चुकी हैं। (अभितः) हम उपासकों के चारों ओर बसे हुए (जनासः) लोग तो (मुह्यन्तु) मोह-ममता में ग्रसित हैं, परन्तु (इह) इन हमारे जीवनों में, (मघवा) आध्यात्मिक सम्पत्तियों का स्वामी परमेश्वर, (अस्माकम्) हम उपासकों को (सूरिः) प्रेरणाऐं देने वाला (अस्तु) हुआ है।
Footnote
[ इस सम्बन्ध में ऋग्वेद ८। ४४। ३२ मन्त्र अधिक प्रकाश डालता है । यथाः—“यदग्ने स्यामहं त्वं, त्वं वा घा स्या ग्रहम् । स्युष्टे सत्या इहाशिषः” । योग दो प्रकार का है ध्यानयोग और क्रियायोग : ध्यानयोग में ध्याता, परमेश्वर में चित्तवृत्ति को लगा कर परमेश्वर में अपने आप को तन्मय बना लेता है, मानो वह अपनी स्थिति खोकर तद्रूप हो गया है । यह अभिप्राय प्रकट हुआ है “स्याम् अह त्वम्”—शब्दों द्वारा, अर्थात् “मैं,—तू हो गया हूं” । क्रियायोग में उपासक परमेश्वर को, “अहम्” रूप में प्रकट कर लेता है । इस अवस्था में उपासक अपने “अहंभाव” से प्रेरणाएँ न पा कर केवल परमेश्वर द्वारा ही प्रेरणाएँ पा रहा होता है, उस समय मानो परमेश्वर ने उपासक के “अहं भाव” का रूप धारण कर लिया है, मानो उपासक की देह अब उपासक की नहीं रही, वह परमेश्वर की देह बन चुकी है। क्योंकि उस में उपासक की निजप्रेरणाएँ नहीं हो रही होतीं अपितु परमेश्वरीय प्रेरणाएँ ही हो रही होती हैं । इस अभिप्राय को “त्वं वा घ स्या अहम्”, इन शब्दों द्वारा प्रकट किया है । १५८९ मन्त्र में इस अभिप्राय को “स्वा हि ते”—शब्दों द्वारा प्रकट किया है । अर्थात् यह तनु अब आप की हो चुकी है ]