SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1586

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सुकक्ष आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
क꣢या꣣ त्वं꣡ न꣢ ऊ꣣त्या꣡भि प्र म꣢꣯न्दसे वृषन् । क꣡या꣢ स्तो꣣तृ꣢भ्य꣣ आ꣡ भ꣢र ॥१५८६॥

क꣡या꣢꣯ । त्वम् । नः꣣ । ऊत्या꣢ । अ꣡भि꣢ । प्र । म꣣न्दसे । वृषन् । क꣡या꣢꣯ । स्तो꣣तृ꣡भ्यः꣢ । आ । भ꣣र ॥१५८६॥

Mantra without Swara
कया त्वं न ऊत्याभि प्र मन्दसे वृषन् । कया स्तोतृभ्य आ भर ॥

कया । त्वम् । नः । ऊत्या । अभि । प्र । मन्दसे । वृषन् । कया । स्तोतृभ्यः । आ । भर ॥१५८६॥

Samveda - Mantra Number : 1586
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(वृषन्) हे सुख-शान्ति की वर्षा करने वाले !, (कया) किस प्रकार की (ऊत्या) रक्षा द्वारा, (त्वम्) आप (नः) हमें (अभि प्र मन्दसे) सब प्रकार से प्रमुदित कर रहे हैं । तथा (कया) किस प्रकार की रक्षा द्वारा, (स्तोतृभ्यः) स्तोताओं के लिये (आ भर) भरपूर आनन्द दे रहे हैं ।
Footnote
[ उपासक अनुभव करता है कि शास्त्रों और महात्माओं द्वारा सुना गया है कि परमेश्वर माता, पिता, बन्धु, सखा, रक्षक, पालक तथा दयावान् आदि है, परन्तु उस की प्रजा में दुःख, कष्ट, पीड़ा, रोग, गरीबी, मृत्यु आदि भी दुःखदायी घटनाएँ हैं, — इन विषमताओं में समन्वय कैसे है, — यह जानने की इच्छा वह प्रभु के प्रति प्रकट कर रहा है । परन्तु मन्त्र में ही—“क्या (सुखमय्या), वृषन् प्रमन्दसे” शब्दों द्वारा इन में समन्वय की भी सूचना दे दी है। माता-पिता बच्चे को दण्ड देते हैं बच्चे के भावी सुख के लिये; न्यायाधीश अपराधी को दण्ड देता है उसके भावी सुख के लिये । यही व्यवस्था परमेश्वर की भी है ]