SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1577

1871 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ अ꣡प꣢स꣣स्प꣢꣯र्युप꣣ प्र꣡ य꣢न्ति धी꣣त꣡यः꣢ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ प꣣थ्या꣢३ अ꣡नु꣢ ॥१५७७॥

इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣣ग्नीइ꣡ति꣢ । अ꣡प꣢꣯सः । प꣡रि꣢꣯ । उ꣡प꣢꣯ । प्र । य꣣न्ति । धीत꣡यः꣢ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । प꣣थ्याः꣢ । अ꣡नु꣢꣯ ॥१५७७॥

Mantra without Swara
इन्द्राग्नी अपसस्पर्युप प्र यन्ति धीतयः । ऋतस्य पथ्या३ अनु ॥

इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । अपसः । परि । उप । प्र । यन्ति । धीतयः । ऋतस्य । पथ्याः । अनु ॥१५७७॥

Samveda - Mantra Number : 1577
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 16; Khand » 1;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्राग्नी) बलशक्ति और ज्ञानशक्ति सम्पन्न हे परमेश्वर ! आप की कृपा से, (ऋतस्य) सत्यमय जीवन के (पथ्याः) हितकर मार्गों के (अनु) अनुसार, (अपसः) हमारे कर्म (प्र यन्ति) चलते हैं, और (धीतयः) हमारी धारणा-ध्यान आदि योगसाधनाएँ (प्र) प्रकर्षरूप में, (उप) और समीपता से, हमारे कर्मों के (परि) चारों ओर (यन्ति) परिधिरूप में घेरा डाले हुई हैं ।
Footnote
[ मन्त्र में कर्मों को “केन्द्र” और योगसाधनों को “परिधिरूप” में वर्णित किया है । केन्द्र कभी परिधि से बाहिर नहीं हो सकता । उपासकों के कर्म भी धारणा ध्यान आदि की परिधि से बाहिर न होने चाहियें, अपितु धारणा ध्यान आदि से सदा घिरे रहने चाहियें ]