SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1547

1871 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- त्रित आप्त्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
कृ꣣ष्णां꣡ यदेनी꣢꣯म꣣भि꣡ वर्प꣢꣯सा꣣भू꣢ज्ज꣣न꣢य꣣न्यो꣡षां꣢ बृह꣣तः꣢ पि꣣तु꣢र्जाम् । ऊ꣣र्ध्वं꣢ भा꣣नु꣡ꣳ सूर्य꣢꣯स्य स्तभा꣣य꣢न्दि꣣वो꣡ वसु꣢꣯भिरर꣣ति꣡र्वि भा꣢꣯ति ॥१५४७

कृ꣣ष्णा꣢म् । यत् । ए꣡नी꣢꣯म् । अ꣣भि꣢ । व꣡र्प꣢꣯सा । भूत् । ज꣣न꣡य꣢न् । यो꣡षा꣢꣯म् । बृ꣣हतः꣢ । पि꣣तुः꣢ । जाम् । ऊ꣣र्ध्व꣢म् । भा꣣नु꣢म् । सू꣡र्य꣢꣯स्य । स्त꣣भाय꣡न् । दि꣣वः꣢ । व꣡सु꣢꣯भिः । अ꣣रतिः꣡ । वि । भा꣣ति ॥१५४७॥

Mantra without Swara
कृष्णां यदेनीमभि वर्पसाभूज्जनयन्योषां बृहतः पितुर्जाम् । ऊर्ध्वं भानुꣳ सूर्यस्य स्तभायन्दिवो वसुभिररतिर्वि भाति ॥१५४७

कृष्णाम् । यत् । एनीम् । अभि । वर्पसा । भूत् । जनयन् । योषाम् । बृहतः । पितुः । जाम् । ऊर्ध्वम् । भानुम् । सूर्यस्य । स्तभायन् । दिवः । वसुभिः । अरतिः । वि । भाति ॥१५४७॥

Samveda - Mantra Number : 1547
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
हे परमेश्वर ! आप (यद्) जब (कृष्णाम्) काली तामसी चितवृत्तियों को, तथा (एनीम्) चितकबरी अर्थात् रजस्तमोमयी चित्तवृत्तियों को, (वर्पसा) निज समुज्ज्वल स्वरूप द्वारा, (अभि अभूत्) पराभूत कर देते हैं, तब आप (बृहतः पितुः) महापालक सूर्यरूपी पिता से (जाम्) उत्पन्न हुई (योषाम्) नानावर्णों से मिश्रित उषा के सदृश, (योषाम्) नानारूपों से मिश्रित सत्त्वगुणमयी “विशोका” वृत्ति को (जनयन्) जन्म देते हैं । तदनन्तर आप (ऊर्ध्वम् दिवः) ऊपर मस्तिष्क में (सूर्यस्य) सहस्रार-चक्ररूपी सूर्य की (भानुम्) प्रभा को (स्तभायन्) थामते हुए, (वसुभिः) मस्तिष्क में बसे हुए निज दिव्य तेजों द्वारा (वि भाति) विशेशरूप में चमकते हैं । (अरतिः) आप सर्वथा अलिप्त हैं, रतिरहित हैं ।
Footnote
[ विशोका ज्योतिष्मतीः—(योग० १। ३६) । व्यासमुनि कहते हैं कि “हृदय पुण्डरीके धारयतो या बुद्धि-संवित् । बुद्धिसत्वं हि भास्वरमाकाशकल्पं, तत्र स्थिति-वैशारद्यात् प्रवत्तिः, सूर्येन्दुग्रह मणिप्रभारूपाकारेण विकलते, एषा प्रवृत्तिर्ज्योतिष्मतीति उच्यते” । अर्थात् “हृदय कमल”—चित्त का स्थान है । योगी जब हृदयस्थ चित्त में धारणा ध्यान करता है तब उसे चित्त के यथार्थ स्वरूप का ज्ञान होता है । यह बुद्धिसत्त्व अर्थात् सत्वगुणमय चित्त आकाश-सदृश शुद्ध है । यह चित्त, ध्याता को, उस समय सूर्य, चन्द्र, ग्रह, और मणियों की प्रभाओं के रूपों के सदृश नानाविध आकारों में नानारूपों में, दृष्टिगोचर होने लगता है । मन्त्र में इस “विशोका ज्योतिष्मती प्रवृत्ति” को “ज्ञानमयी उषा” कहा है ।
सूर्य या सहस्रार चक्रः—मन्त्र में “दिवः” पद द्वारा मस्तिष्क को सूचित किया है, तत्सम्बन्धी सूर्य “सहस्रारचक्र” है । “शीर्ष्णोः द्यौः समवर्तत” (यजु० ३१। १३) में द्यु का सम्बन्ध सिर के साथ दर्शाया है । सहस्रार-चक्र का अर्थ है ऐसा चक्र जिस के ‘अरे’ (spokes) हजारों हैं। सूर्य भी चक्राकार है, और उस की हजारों किरणें उस के हजारों “अरे” रूप है । इसीलिये सूर्य को “सहस्रांशु” भी कहते है । सहस्रार चक्र तालु के ऊपर मस्तिक में स्थित है, और सब शक्तियों का केन्द्र है । नाना रंग के प्रकाश से युक्त सहस्र दलों वाले कमल जैसा है । पर ब्रह्म अपनी महाशक्ति के साथ यहां प्रकट होता है । इसी सहस्रार चक्र में असम्प्रज्ञातसमाधि द्वारा जीवात्मा मुक्त हो जाता है (देखो पातञ्जल योग प्रदीप, ग्रन्थकार स्वामी ओमानन्द तीर्थ ]