SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 154

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः, वामदेवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
सो꣡मः꣢ पू꣣षा꣡ च꣢ चेततु꣣र्वि꣡श्वा꣢साꣳ सुक्षिती꣣ना꣢म् । दे꣣वत्रा꣢ र꣣꣬थ्यो꣢꣯र्हि꣣ता꣢ ॥१५४

सो꣡मः꣢꣯ । पू꣣षा꣢ । च꣣ । चेततुः । वि꣡श्वा꣢꣯साम् । सु꣣क्षितीना꣢म् । सु꣣ । क्षितीना꣢म् । दे꣣वत्रा꣢ । र꣣थ्योः꣢꣯ । हि꣣ता꣢ ॥१५४॥

Mantra without Swara
सोमः पूषा च चेततुर्विश्वासाꣳ सुक्षितीनाम् । देवत्रा रथ्योर्हिता ॥१५४

सोमः । पूषा । च । चेततुः । विश्वासाम् । सुक्षितीनाम् । सु । क्षितीनाम् । देवत्रा । रथ्योः । हिता ॥१५४॥

Samveda - Mantra Number : 154
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(समः) भक्तिरस (च) तथा (पूषा) भक्तिरस से परिपुष्ट हुआ जीवात्मा, ये दोनों, (सुक्षितीताम्) पृथिवीवासी (विश्वासाम्) समस्त मनुष्यों में (चेततुः) एक नई चेतावनी या जागृति उत्पन्न कर देते हैं, (देवत्राः) ये दोनो अर्थात् सोम-और-पूषा दिव्य गुणों की रक्षा करते हैं, तथा (रथ्योः) शरीर-रथ के स्वामी अर्थात् मन-और बुद्धि के लिए (हिता) हितकर होते हैं ।
Footnote
[ रथ्योः = रथी + षष्ठी विभक्ति + द्विवचन । उपनिषद् के अनुसार शरीर = रथ का रथी अर्थात् स्वामी “आत्मा” है । परन्तु सांसारिक जीवन में आत्मा स्वामी न बन कर मन और बुद्धि शरीर-रथ के स्वामी बने रहते हैं । भक्ति रस तथा भक्तिरस से परिपुष्ट आत्मा, जब शरीर-रथ के स्वामी बनते हैं तो ये, दोनों अर्थात् मन-और-बुद्धि को नियन्त्रित कर, जीवन में हितकर हो जाते हैं ]