SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1536

1871 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्वं꣢ जा꣣मि꣡र्जना꣢꣯ना꣣म꣡ग्ने꣢ मि꣣त्रो꣡ अ꣢सि प्रि꣣यः꣢ । स꣢खा꣣ स꣡खि꣢भ्य꣣ ई꣡ड्यः꣢ ॥१५३६॥

त्वम् । जा꣣मिः꣢ । ज꣡ना꣢꣯नाम् । अ꣡ग्ने꣢꣯ । मि꣣त्रः꣢ । मि꣣ । त्रः꣢ । अ꣣सि । प्रियः꣢ । स꣡खा꣢꣯ । स । खा꣣ । स꣡खि꣢꣯भ्यः । स । खि꣣भ्यः । ई꣡ड्यः꣢꣯ ॥१५३६॥

Mantra without Swara
त्वं जामिर्जनानामग्ने मित्रो असि प्रियः । सखा सखिभ्य ईड्यः ॥

त्वम् । जामिः । जनानाम् । अग्ने । मित्रः । मि । त्रः । असि । प्रियः । सखा । स । खा । सखिभ्यः । स । खिभ्यः । ईड्यः ॥१५३६॥

Samveda - Mantra Number : 1536
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 15; Khand » 1;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) हे प्रकाशस्वरूप प्रभो ! (जनानाम्) प्रजाजनों के (त्वम्) आप ही (जाभिः) सच्चे बन्धु हैं, आप (मित्रः प्रियः सखा असि) स्नेह करने वाले, प्रिय, तथा सखा हैं, आप (सखिभ्यः ईड्यः) सखाओं से स्तुति के योग्य हैं ।
Footnote
[ मन्त्र १५३५ के प्रश्नों के उत्तर मन्त्र १५३६ में दिये गये हैं । “कः जामिः” का उत्तर है “त्वं जामिः” ।
कः दाश्वध्वरः”, का उत्तर है “सखिभ्यः ईड्यः” । यही उत्तर है—“कस्मिन् श्रितः” का । “को ह” का उत्तर है मित्रः प्रियः, सखा । ईड्यः = स्तुति और प्रार्थना के सम्बन्ध में वैदिक भावना यह है कि प्रत्यक्षरूप में उपस्थित हुए परमात्मा की स्तुति प्रार्थना वस्तुतः स्तुति-प्रार्थना है । और परमात्मा का प्रत्यक्ष तब होता है जब कि उपासक अपने आप को तथा अपने सर्वस्व को परमात्मा के प्रति समर्पित कर देता है । अतः इस में “दाश्वध्वरः” की भावना स्पष्ट हो जाती है । परमात्मा के प्रत्यक्ष होने का अभिप्राय है उस का उपासक के हृदय में अभिव्यक्त हो जाना । जब परमात्मा उपासक के हृदय का वासी वन जाता है तो वह उपासक के हृदय में आश्रय पाए हुए होता है । अतः “कस्मिन् श्रितः” का उत्तर भी “सखिभ्यः ईड्यः” इन शब्दों में मिल जाता है ]