SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1534

1871 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विरूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣡द꣢ग्ने꣣ शु꣡च꣢य꣣स्त꣡व꣢ शु꣣क्रा꣡ भ्राज꣢꣯न्त ईरते । त꣢व꣣ ज्यो꣡ती꣢ꣳष्य꣣र्च꣡यः꣢ ॥१५३४॥

उत् । अ꣣ग्ने । शु꣡च꣢꣯यः । त꣡व꣢꣯ । शु꣣क्राः꣢ । भ्रा꣡ज꣢꣯न्तः । ई꣣रते । त꣡व꣢꣯ । ज्यो꣡ती꣢꣯ꣳषि । अ꣣र्च꣡यः꣢ ॥१५३४॥

Mantra without Swara
उदग्ने शुचयस्तव शुक्रा भ्राजन्त ईरते । तव ज्योतीꣳष्यर्चयः ॥

उत् । अग्ने । शुचयः । तव । शुक्राः । भ्राजन्तः । ईरते । तव । ज्योतीꣳषि । अर्चयः ॥१५३४॥

Samveda - Mantra Number : 1534
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 4;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) हे ज्योतिर्मय प्रभो ! (तव) आप की (शुचयः) पवित्र, (शुक्रा) शुभ, (भ्राजन्तः) सुप्रदीप्त (अर्चयः) ज्वालाएं, तथा (तव) आप की (ज्योतींषि) नानाविध ज्योतियां (उद् ईरते) मेरे हृदय में उदित हो रही हैं, प्रकट हो रही हैं ।
Footnote
[ अर्चयः, ज्योतींषि = हृदय में चित्त को लगा कर जब ध्यान किया जाता है तब ध्यान की दृढ़ता में नानाविध ज्योतियां प्रकट होने लगती हैं । योगदर्शन, १। ३६ के व्यास भाष्य में लिखा है कि “बुद्धिसत्त्वं हि भास्वरं, तत्र स्थिति वैशारद्यात् प्रवृत्तिः, सूर्येन्दुग्रहमणिप्रभारूपाकारेण विकल्पते”, अर्थात् हृदयस्थ बुद्धि सत्त्व, में अर्थात् सत्त्वगुणमय बुद्धि तत्त्व में जब मन स्थिर हो जाता हैं, तब सूर्य, चन्द्र, ग्रह, और मणियों की प्रभाएँ दृष्टिगोचर होने लगती हैं। श्वेताश्वतर उपनिषद् में कहा है कि अभ्यास प्रक्रम में अभ्यासी को कोहरा, धूम्र, सूर्य, वायु, अग्नि, जुगनु या सितारे, विद्युत्, स्फटिक, चन्द्रमा, — ऐसी ज्योतियां प्रकट होने लगती हैं, ब्रह्माभिव्यक्ति के पूर्वरूप हैं । यथाः—“नीहार धूम्रार्कानिलानलानां खद्योत विद्यत् स्फटिक शशीनाम् । एतानि रूपाणि पुरःसराणि ब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगे” (श्वेताश्व० अध्याय २, खण्ड ११) ]