SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1532

1871 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विरूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣢र्मू꣣र्धा꣢ दि꣣वः꣢ क꣣कु꣡त्पतिः꣢꣯ पृथि꣣व्या꣢ अ꣣य꣢म् । अ꣣पा꣡ꣳ रेता꣢꣯ꣳसि जिन्वति ॥१५३२॥

अ꣣ग्निः꣢ । मू꣣र्धा꣢ । दि꣣वः꣢ । क꣣कु꣢त् । प꣡तिः꣢꣯ । पृ꣣थिव्याः꣢ । अ꣡य꣢म् । अ꣣पा꣢म् । रे꣡वा꣢꣯ꣳसि । जि꣢न्वति ॥१५३२॥

Mantra without Swara
अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम् । अपाꣳ रेताꣳसि जिन्वति ॥

अग्निः । मूर्धा । दिवः । ककुत् । पतिः । पृथिव्याः । अयम् । अपाम् । रेवाꣳसि । जिन्वति ॥१५३२॥

Samveda - Mantra Number : 1532
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 4;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(अग्निः) ज्योतिर्मय प्रभु (मूर्धा) संसार का शिरोमणि है, (दिवः) धुलोक की (ककुत्) सर्वोच्च शक्ति है, (अयम्) और यह (पृथिव्याः पतिः) पृथिवी का स्वामी है। (अपाम्) कर्मों के (रेतांसि) बीजों को, अर्थात् संस्कारों को, (जिन्वति) तृप्त करता है ।
Footnote
[ जिन्वति = संस्कारों को तृप्त करने के दो अभिप्राय हैं। कर्मों के करने के लिये उन्हें शुद्ध करना, जैसे कि सुषुप्ति के अनन्तर संस्कार पुनः उद्बुद्ध हो कर कर्मों के प्रेरक हो जाते हैं । (२) तृप्ति का अभिप्राय यह भी है कि जीवन्मुक्तों के संस्कारों को पुनः उद्बुद्ध न होने देना, परिणामरूप में जीवन्मुक्त शरीर आदि से मुक्त हो जाते हैं ]