SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1530

1871 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- केतुराग्नेयः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣢ग्ने꣣ न꣡क्ष꣢त्रम꣣ज꣢र꣣मा꣡ सूर्य꣢꣯ꣳ रोहयो दि꣣वि꣢ । द꣢ध꣣ज्ज्यो꣢ति꣣र्ज꣡ने꣢भ्यः ॥१५३०॥

अ꣡ग्ने꣢꣯ । न꣡क्ष꣢꣯त्रम् । अ꣣ज꣡र꣢म् । अ꣣ । ज꣡र꣢꣯म् । आ । सू꣡र्य꣢꣯म् । रो꣣हयः । दि꣣वि꣢ । द꣡ध꣢꣯त् । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । ज꣡ने꣢꣯भ्यः ॥१५३०॥

Mantra without Swara
अग्ने नक्षत्रमजरमा सूर्यꣳ रोहयो दिवि । दधज्ज्योतिर्जनेभ्यः ॥

अग्ने । नक्षत्रम् । अजरम् । अ । जरम् । आ । सूर्यम् । रोहयः । दिवि । दधत् । ज्योतिः । जनेभ्यः ॥१५३०॥

Samveda - Mantra Number : 1530
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 4;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) हे प्रकाशस्वरूप जगन्नेता ! आप ने (अजरम्) जरारहित अर्थात् जीर्ण न होने वाले (सूर्य नक्षत्रम्) सूर्यरूपी नक्षत्र को (दिवि) द्यलोक में (आ रोहयः) आरूढ़ किया है, चढ़ाया है, और आप ने (जनेभ्यः) प्राणियों के लिये (ज्योतिः दधत्) सूर्य को ज्योतिरूप में स्थापित किया है ।
Footnote
[ रात्रि के समय द्युलोक में जो चमकते तारे दिखाई देते हैं, वे प्रायः कर के सब सूर्यरूप हैं । दूरी के कारण वे छोटे-छोटे दिखाई देते हैं । हमारा सूर्य समीप होने के कारण बड़ा दिखाई देता है । यह सूर्य दिन का नक्षत्र है । नक्षत्र का अर्थ है “न क्षीण होने वाला”। इसी भाव को “अजर” शब्द भी प्रकट करता है । अथर्ववेद में २८ नक्षत्रों का भी वर्णन हुआ है (अथर्व काण्ड १९। सूक्त ७, ८) । इन नक्षत्रों का अधिपति चन्द्रमा माना है । ये २८ नक्षत्र वे हैं जिन में चन्द्रमा गति करता है, एक मास में एक बार गति करता है ]