SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1502

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वत्सः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ये꣡ त्वामि꣢꣯न्द्र꣣ न꣡ तु꣢ष्टु꣣वु꣡रृष꣢꣯यो꣣ ये꣡ च꣢ तुष्टु꣣वुः꣢ । म꣡मे꣢꣯द्वर्धस्व꣣ सु꣡ष्टु꣢तः ॥१५०२॥

ये । त्वाम् । इ꣣न्द्र । न꣢ । तु꣣ष्टुवुः꣢ । ऋ꣡ष꣢꣯यः । ये । च꣣ । तुष्टुवुः꣢ । म꣡म꣢꣯ । इत् । व꣣र्धस्व । सु꣡ष्टु꣢꣯तः । सु । स्तु꣢तः ॥१५०२॥

Mantra without Swara
ये त्वामिन्द्र न तुष्टुवुरृषयो ये च तुष्टुवुः । ममेद्वर्धस्व सुष्टुतः ॥

ये । त्वाम् । इन्द्र । न । तुष्टुवुः । ऋषयः । ये । च । तुष्टुवुः । मम । इत् । वर्धस्व । सुष्टुतः । सु । स्तुतः ॥१५०२॥

Samveda - Mantra Number : 1502
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 1;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे परमेश्वर ! (ये) जो अनृषिकोटि के लोग (त्वाम्) आप की (न तुष्टुवुः) स्तुति नहीं करते, (च) और (ये ऋषयः) जो ऋषिकोटि के लोग (त्वाम्) आप की स्तुति करते हैं, उन में से (मम) मेरी स्तुतियों द्वारा (सुष्टुतः) उत्तम स्तुतियां पा कर आप (वर्द्धस्व इत्) सब की ही वृद्धि कीजिये ।
Footnote
[ मन्त्र में तीन प्रकार के लोगों का वर्णन हुआ है, अनृषि, ऋषि, महर्षि का । उपासक महर्षि कोटि का प्रतीत होता है, तभी इस उपासक की स्तुतियों को “सुस्तुतियां” कहा है (सुष्टुतः) । ऐसे महर्षि कोटि के उपासक सब की वृद्धि चाहते हैं, इसलिये सब की वृद्धि के लिये वे परमेश्वर की उत्तम स्तुतियां करते रहते हैं ]