SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1492

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेधपुरुमेधावाङ्गिरसौ Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
आ꣢ नो꣣ वि꣡श्वा꣢सु꣣ ह꣢व्य꣣मि꣡न्द्र꣢ꣳ स꣣म꣡त्सु꣢ भूषत । उ꣢प꣣ ब्र꣡ह्मा꣢णि꣣ स꣡व꣢नानि वृत्रहन्परम꣣ज्या꣡ ऋ꣢चीषम ॥१४९२॥

आ꣢ । नः꣣ । वि꣡श्वा꣢꣯सु । ह꣡व्य꣢꣯म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । स꣣म꣡त्सु꣢ । स꣣ । म꣡त्सु꣢꣯ । भू꣣षत । उ꣡प꣢꣯ । ब्र꣡ह्मा꣢꣯णि । स꣡व꣢꣯नानि । वृ꣣त्रहन् । वृत्र । हन् । परमज्याः꣢ । प꣣रम । ज्याः꣢ । ऋ꣣चीषम ॥१४९२॥

Mantra without Swara
आ नो विश्वासु हव्यमिन्द्रꣳ समत्सु भूषत । उप ब्रह्माणि सवनानि वृत्रहन्परमज्या ऋचीषम ॥

आ । नः । विश्वासु । हव्यम् । इन्द्रम् । समत्सु । स । मत्सु । भूषत । उप । ब्रह्माणि । सवनानि । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । परमज्याः । परम । ज्याः । ऋचीषम ॥१४९२॥

Samveda - Mantra Number : 1492
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 7; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 14; Khand » 1;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
हे उपासको ! (विश्वासु) समस्त (समत्सु) देवासुर-संग्रामों में, (नः) हम सब की सहायता के लिये, (हव्यम्) आह्वान योग्य (इन्द्रम्) परमेश्वर को (आ भूषत्) अलंकृत किया करो, स्तुतियों द्वारा उस की शोभा बढ़ाया करो, और कहा करो कि (वृत्रहन) हे पाप-वृत्रों का हनन करने वाले !, (ऋचीषम) हे ऋचात्रों में समरूप से वर्णित ! आप (परमज्या) सर्वोत्कृष्ट धनुष-डोरी हैं पाप-वृत्रों के विनाश के लिये, आप के लिये हमारी (ब्रह्माणि) वैदिक स्तुतियां और (सवनानि) यज्ञिय कर्म (उप) उपस्थित हैं ।
Footnote
[ प्रणव तो धनुष है (मुण्डक० २। २। ४), और परमेश्वर इस धनुष की डोरी है, जिस के सहारे आत्मरूपीशर में शक्ति आती हैं ]