SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1465

1871 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- यजत आत्रेयः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ता꣡ नः꣢ शक्तं꣣ पा꣡र्थि꣢वस्य म꣣हो꣢ रा꣣यो꣢ दि꣣व्य꣡स्य꣢ । म꣡हि꣢ वां क्ष꣣त्रं꣢ दे꣣वे꣡षु꣢ ॥१४६५॥

ता꣢ । नः꣣ । शक्तम् । पा꣡र्थि꣢꣯वस्य । म꣣हः꣢ । रा꣣यः꣢ । दि꣣व्य꣡स्य꣢ । म꣡हि꣢꣯ । वा꣣म् । क्षत्र꣢म् । दे꣣वे꣡षु꣢ ॥१४६५॥

Mantra without Swara
ता नः शक्तं पार्थिवस्य महो रायो दिव्यस्य । महि वां क्षत्रं देवेषु ॥

ता । नः । शक्तम् । पार्थिवस्य । महः । रायः । दिव्यस्य । महि । वाम् । क्षत्रम् । देवेषु ॥१४६५॥

Samveda - Mantra Number : 1465
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 4;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
स्नेह करने वाले परमेश्वर की स्नेह शक्ति, तथा पापों से निवारण करने वाले परमेश्वर की पापनिवारण शक्ति, (ता) वे दोनों शक्तियां, (नः) हमें (पार्थिवस्य) सांसारिक तथा (दिव्यस्य) आध्यात्मिक (महः रायः) महासम्पत्तियों के प्रदान में (शक्तम्) समर्थ हैं । हे दोनों शक्तियो ! (देवेषु) देवकोटि के व्यक्तियों में (वाम) तुम दोनों का (महि क्षत्रम्) क्षतियों से त्राण करने का महाबल प्रसिद्ध है ।
Footnote
[ मन्त्र ११४३ तथा ११४४ में मित्र और वरुण का वर्णन है । इन्हीं का वर्णन १४६५ में भी है। मित्र का अर्थ है स्नेह करने वाला, और वरुण का अर्थ है पापों से निवारण करने वाला । पापों से निवारण जितना स्नेह द्वारा हो सकता है उतना दण्ड द्वारा नहीं हो सकता । यह मन्त्र पूर्णवर्णित ११४५ संख्या का है ]