SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1454

1871 Mantra
Devata- सूर्यः Rishi- विभ्राट् सौर्यः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
वि꣣भ्रा꣢ड् बृ꣣ह꣡त्सुभृ꣢꣯तं वाज꣣सा꣡त꣢मं꣣ ध꣡र्मं꣢ दि꣣वो꣢ ध꣣रु꣡णे꣢ स꣣त्य꣡मर्पि꣢꣯तम् । अ꣣मित्रहा꣡ वृ꣢त्र꣣हा꣡ द꣢स्यु꣣ह꣡न्त꣢मं꣣ ज्यो꣡ति꣢र्जज्ञे असुर꣣हा꣡ स꣢पत्न꣣हा꣢ ॥१४५४॥

वि꣣भ्रा꣢ट् । वि꣣ । भ्रा꣢ट् । बृ꣣ह꣢त् । सु꣡भृ꣢꣯तम् । सु । भृ꣣तम् । वाजसा꣡त꣢मम् । वा꣣ज । सा꣡त꣢꣯मम् । ध꣡र्म꣢꣯न् । दि꣣वः꣢ । ध꣣रु꣡णे꣢ । स꣣त्य꣢म् । अ꣡र्पि꣢꣯तम् । अ꣣मित्रहा꣢ । अ꣣मित्र । हा꣢ । वृ꣣त्रहा꣢ । वृ꣣त्र । हा꣢ । द꣣स्युह꣡न्त꣢मम् । द꣣स्यु । ह꣡न्त꣢꣯मम् । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । ज꣣ज्ञे । असुरहा꣢ । अ꣣सुर । हा꣢ । स꣣पत्नहा꣢ । स꣣पत्न । हा꣢ ॥१४५४॥

Mantra without Swara
विभ्राड् बृहत्सुभृतं वाजसातमं धर्मं दिवो धरुणे सत्यमर्पितम् । अमित्रहा वृत्रहा दस्युहन्तमं ज्योतिर्जज्ञे असुरहा सपत्नहा ॥

विभ्राट् । वि । भ्राट् । बृहत् । सुभृतम् । सु । भृतम् । वाजसातमम् । वाज । सातमम् । धर्मन् । दिवः । धरुणे । सत्यम् । अर्पितम् । अमित्रहा । अमित्र । हा । वृत्रहा । वृत्र । हा । दस्युहन्तमम् । दस्यु । हन्तमम् । ज्योतिः । जज्ञे । असुरहा । असुर । हा । सपत्नहा । सपत्न । हा ॥१४५४॥

Samveda - Mantra Number : 1454
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 3;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(बिभ्राट्) सुप्रदीप्त, (बृहत्) महतो महान्, (सुभृतम्) अच्छे प्रकार भरणपोषण करने वाला, (वाजसातमम्) बलप्रदान में सर्वश्रेष्ठ, (दिवः धर्मम्) प्रकाशधारी, (धरुणे) और सौर मण्डल के धर्त्ता सूर्य में (अर्पितम्) स्थित, (सत्यं ज्योतिः) सत्यस्वरूप ज्योतिः (जज्ञे) मुझ उपासक में प्रकट हो गई है । वह ज्योतिः (अमित्रहा) स्नेह करने वाले कामक्रोध आदि का विनाशक है, (वृत्रहा) आत्मिक शक्तियों पर आवरण डाल देने वाले राग-द्वेष आदि का विनाशक हैं, (दस्युहन्तमम्) उपक्षय करने वाले लोभ मोह आदि का विशेषरूप में विनाशक है, (असुरहा) प्राणपोषण में रत व्यक्तियों को परे रखने वाला, तथा (सपत्नहा) सपत्नों का विनाशक है ।
Footnote
[ धरुणे अर्पितम् = “योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसावहम् । ओ३म् खं ब्रह्म” (यजु० ४०। १७) । अमित्रहा = उपासक, काम-क्रोध आदि को, अमित्र समझता है, अप्रिय समझता है; अ + मिद् (स्नेहने) । वृत्रहा = रागद्वेष आदि वृत्र हैं, ये व्यक्ति की सद्बुद्धि पर आवरण डाल देते हैं, वृञ् आवरणे । दस्यु = काम-क्रोध आदि जब व्यक्ति का उपक्षय अर्थात् विनाश करने में उन्मुख हो जाते हैं तो इन्हें दस्यु कहते हैं ; दसु उपक्षये । असुरहा = असुर + ओहाक् त्यागे । कामक्रोध आदि जब केवल, प्राणपोषण मात्र के लिये प्रेरित करते हैं, और इस से अतिरिक्त और कोई ऊँचा उद्देश्य नहीं होता तो इन्हें असुर कहते हैं, असु (प्राण) + र (रत) । सपत्न = मन की दो प्रकार की वृत्तियां होती हैं, सात्विक ओर असात्विक, आत्मा इन दोनों का पति है । ये दो प्रकार की मनोवृत्तियां आत्मा की पत्नी हैं । प्रतिबुद्ध आत्मा की असली पत्नी है सात्विक वृत्ति । अप्रतिबुद्ध आत्मा की पत्नी होती है असात्विक वृत्ति । प्रतिबुद्ध आत्मा असात्विक वृत्ति को, सात्विक वृत्ति की, सपत्नी अर्थात् दुश्मन समझता है । इस लिये सपत्न का अर्थ है दुश्मन, शत्रु ]