SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1450

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सुकक्ष आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣢꣯द्घेद꣣भि꣢ श्रु꣣ता꣡म꣢घं वृष꣣भं꣡ नर्या꣢꣯पसम् । अ꣡स्ता꣢रमेषि सूर्य ॥१४५०॥

उ꣢त् । घ꣣ । इ꣢त् । अ꣣भि꣢ । श्रु꣣ता꣡म꣢घम् । श्रु꣣त꣢ । म꣣घम् । वृषभ꣢म् । न꣡र्या꣢꣯पसम् । न꣡र्य꣢꣯ । अ꣣पसम् । अ꣡स्ता꣢꣯रम् । ए꣣षि । सूर्य ॥१४५०॥

Mantra without Swara
उद्घेदभि श्रुतामघं वृषभं नर्यापसम् । अस्तारमेषि सूर्य ॥

उत् । घ । इत् । अभि । श्रुतामघम् । श्रुत । मघम् । वृषभम् । नर्यापसम् । नर्य । अपसम् । अस्तारम् । एषि । सूर्य ॥१४५०॥

Samveda - Mantra Number : 1450
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(सूर्य) आध्यात्मिक अन्धकार को दूर करने वाले सूर्यों के सूर्य परमेश्वर ! आप (ह) निश्चय से, और (इत्) अवश्य, ऐसे उपासक के प्रति (अभि उद् एषि) प्रत्यक्ष रूप में उदित हो जाते हैं, जिस की कि (श्रुतामघम्) आध्यात्मिक सम्पत्ति विश्रुत है, प्रसिद्ध है, (वृषभम्) जो प्रजाजनों पर सुखों की वर्षा करता, (नर्यापसम्) तथा जिस के कर्म प्रजाजनों का हित करने वाले हैं, (अस्तारम्) तथा जिस ने अपने पाप-शत्रुओं को परास्त कर दिया है ।
Footnote
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