SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1446

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न꣢म꣣से꣡दुप꣢꣯ सीदत द꣣ध्ने꣢द꣣भि꣡ श्री꣢णीतन । इ꣢न्दु꣣मि꣡न्द्रे꣢ दधातन ॥१४४६॥

न꣡म꣢꣯सा । इत् । उ꣡प꣢꣯ । सीदत । दध्ना꣢ । इत् । अ꣣भि꣢ । श्री꣣णीतन । श्री꣣णीत । न । इ꣡न्दु꣢꣯म् । इ꣡न्द्रे꣢꣯ । द꣣धातन । दधात । न ॥१४४६॥

Mantra without Swara
नमसेदुप सीदत दध्नेदभि श्रीणीतन । इन्दुमिन्द्रे दधातन ॥

नमसा । इत् । उप । सीदत । दध्ना । इत् । अभि । श्रीणीतन । श्रीणीत । न । इन्दुम् । इन्द्रे । दधातन । दधात । न ॥१४४६॥

Samveda - Mantra Number : 1446
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 13; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
हे उपासको ! (नमसा) नमस्कार करते हुए तुम, परमेश्वर के (उप) समीप (सीदत) आसन जमाया करो, उपस्थान किया करो, (दध्ना इत्) और ध्यानों द्वारा ही (अभि) परमेश्वर को स्वाभिमुख कर के, (श्रीणीतन) परमेश्वरीय भावनाओं को परिपक्व किया करो, और (इन्दुम्) भक्तिरस को (इन्द्रे) परमेश्वर में (दधातन) दृढ़ स्थापित किया करो ।
Footnote
[ दध्ना = ध्यान द्वारा । जैसे “दध्यङ्” पद में “दधि” पद है । “दध्ना” पद के अर्थ को “दधातन” पद भी स्पष्ट करता है ]