SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1392

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथि0मेध्यातिथी काण्वौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
आ꣢ त्वा꣣ र꣡थे꣢ हिर꣣ण्य꣢ये꣣ ह꣡री꣢ म꣣यू꣡र꣢शेप्या । शि꣣तिपृष्ठा꣡ व꣢हतां꣣ म꣢ध्वो꣣ अ꣡न्ध꣢सो वि꣣व꣡क्ष꣢णस्य पी꣣त꣡ये꣢ ॥१३९२॥

आ꣢ । त्वा꣣ । र꣡थे꣢꣯ । हि꣣रण्य꣡ये꣢ । हरी꣢꣯इ꣡ति꣢ । म꣣यू꣡र꣢शेप्या । म꣣यू꣡र꣢ । शे꣣प्या । शितिपृष्ठा꣢ । शि꣣ति । पृष्ठा꣢ । व꣣हताम् । म꣡ध्वः꣢꣯ । अ꣡न्ध꣢꣯सः । वि꣣व꣡क्ष꣢णस्य । पी꣣त꣡ये꣢ ॥१३९२॥

Mantra without Swara
आ त्वा रथे हिरण्यये हरी मयूरशेप्या । शितिपृष्ठा वहतां मध्वो अन्धसो विवक्षणस्य पीतये ॥

आ । त्वा । रथे । हिरण्यये । हरीइति । मयूरशेप्या । मयूर । शेप्या । शितिपृष्ठा । शिति । पृष्ठा । वहताम् । मध्वः । अन्धसः । विवक्षणस्य । पीतये ॥१३९२॥

Samveda - Mantra Number : 1392
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
हे परमेश्वर ! आप के (हिरण्यये) सुवर्णसदृशपीत (रथे) सूर्य-रथ में जुते हुए, (हरी) दो प्रकार के अश्व अर्थात् किरण-समूह, जो कि (मयूरशेप्या) मयूर की पूंछ के सदृश विविध वर्णों वाले हैं, परन्तु (शितिपृष्ठा) जो परस्परस्पर्श अर्थात् मेल के कारण श्वेतवर्णी हैं, — वे, (त्वा) आप का (आ वहताम्) आवाहन करते हैं, आप को हम तक पहुँचाते हैं, आप का प्रत्यक्ष दर्शन कराते हैं, ताकि (विवक्षणस्य) स्तुतिवक्ता उपासक के (मध्वः) मधुर (अन्धसः) भक्तिरसरूपी अन्नरस का (पीतये) आप पान करें ।
Footnote
[ हिरण्ययेः—रात्रि के समय जो तारे दृष्टिगोचर होते हैं, उन में से ग्रहों को छोड़ कर, शेष सभी सूर्य हैं । ये सूर्य सात प्रकार के वर्णों वाले हैं । लाल, नांरगी वर्ण, पीत, हरे, नीले, आसमानी वर्ण अर्थात् नील के पौदे से निकले “नील” के रंग वाले, और बैंगनी । इन्हें Red, orange, yellow, green, blue, indigo, तथा violet कहते हैं । हमारा सूर्य पीतवर्ण का है, जैसे कि सुवर्ण पीत रंग का होता है । हरी = सूर्य की किरणें दो प्रकार की होती हैं, प्रकाश देने वाली तथा ताप देने वाली । आा वहताम् = सूर्योदय काल में उपासना समाप्त होती है । अन्तर्ध्यानी उपासक जब ओ३म् के जप द्वारा परमेश्वर का ध्यान करता है तब उसे परमेश्वर का साक्षात्कार होता है (योग १। २९) । विवक्षणस्य = वच् + सन् + स्युट् । यथा “विवक्षसे इति, वक्तेः साभ्यासात्” (निरु० अ० ३, पा० ३, खं० १३) ]