SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1391

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथि0मेध्यातिथी काण्वौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
आ꣡ त्वा꣢ स꣣ह꣢स्र꣣मा꣢ श꣣तं꣢ यु꣣क्ता꣡ रथे꣢꣯ हिर꣣ण्य꣡ये꣢ । ब्र꣣ह्म꣢युजो꣣ ह꣡र꣢य इन्द्र के꣣शि꣢नो꣣ व꣡ह꣢न्तु꣣ सो꣡म꣢पीतये ॥१३९१॥

आ꣢ । त्वा꣣ । सह꣡स्र꣢म् । आ । शत꣣म्꣢ । यु꣣क्ताः꣢ । र꣡थे꣢꣯ । हि꣣रण्य꣡ये꣢ । ब्र꣣ह्मयु꣡जः꣢ । ब्र꣣ह्म । यु꣡जः꣢꣯ । ह꣡र꣢꣯यः । इ꣣न्द्र । केशि꣡नः꣢꣯ । व꣡ह꣢꣯न्तु । सो꣡म꣢꣯पीतये । सो꣡म꣢꣯ । पी꣣तये ॥१३९१॥

Mantra without Swara
आ त्वा सहस्रमा शतं युक्ता रथे हिरण्यये । ब्रह्मयुजो हरय इन्द्र केशिनो वहन्तु सोमपीतये ॥

आ । त्वा । सहस्रम् । आ । शतम् । युक्ताः । रथे । हिरण्यये । ब्रह्मयुजः । ब्रह्म । युजः । हरयः । इन्द्र । केशिनः । वहन्तु । सोमपीतये । सोम । पीतये ॥१३९१॥

Samveda - Mantra Number : 1391
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे परमेश्वर ! (हिरण्यये रथे) तेजोमय सूर्य-रथ में (युक्ताः) जुते हुए, (सहस्रम्) हजारों और (शतम्) हजार गुना सौ अर्थात् लाखों, (केशिनः) केशों की तरह फैले हुए प्रकाशमान रश्मिरूपी (हरयः) अश्व, (त्वा आ आ वहन्तु) आप का बार-बार आवाहन करते हैं, जो अश्व कि (ब्रह्मयुजः) उपासकों को, आप-ब्रह्म के साथ, योग-विधि से युक्त करते हैं, — (सोमपीतये) ताकि आप उन के भक्तिरसों को स्वीकार करें ।
Footnote
[ वेदों में सूर्य को सौर मण्डल का केन्द्र माना है । परमेश्वर सर्वव्यापक है । तो भी वह केन्द्ररूपी सूर्य में स्थित हुआ, सूर्य द्वारा, सौर मण्डल को नियन्त्रित कर रहा है । जैसे कि कहा है कि “योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसावहम् । ओ३म् खं ब्रह्म” (यजु० ४०। १७) । प्रातः काल उपासना-काल है, जब कि सूर्य की हजारों और लाखों किरणें आकाश की ओर उछलती हुई परमेश्वर के उपासना-काल का निर्देश करती हैं । इस समय उपासक, योगयुक्त समाधि में आसन जमाए हुए, अपने भक्तिरसों को ब्रह्म के प्रति न्योछावर करते हैं । ]