SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1389

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती) Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अ꣣भ्रातृव्यो꣢ अ꣣ना꣡ त्वमना꣢꣯पिरिन्द्र ज꣣नु꣡षा꣢ स꣣ना꣡द꣢सि । यु꣣धे꣡दा꣢पि꣣त्व꣡मि꣢च्छसे ॥१३८९॥

अ꣣भ्रातृव्यः꣢ । अ꣣ । भ्रातृव्यः꣢ । अ꣣ना꣢ । त्वम् । अ꣡ना꣢꣯पिः । अन् । आ꣣पिः । इन्द्र । जनु꣡षा꣢ । स꣣ना꣢त् । अ꣣सि । युधा꣢ । इत् । आ꣣पित्व꣢म् । इ꣣च्छसे ॥१३८९॥

Mantra without Swara
अभ्रातृव्यो अना त्वमनापिरिन्द्र जनुषा सनादसि । युधेदापित्वमिच्छसे ॥

अभ्रातृव्यः । अ । भ्रातृव्यः । अना । त्वम् । अनापिः । अन् । आपिः । इन्द्र । जनुषा । सनात् । असि । युधा । इत् । आपित्वम् । इच्छसे ॥१३८९॥

Samveda - Mantra Number : 1389
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 12; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे परमेश्वर ! (त्वम्) आप (जनुषा) स्वभावतः, (सनात्) सदा से, (अभ्रातृव्यः) भाई-भतीजे से रहित, (अना) मानुष-चोले से रहित, (अनापिः) तथा अन्य रिश्तेदारी से रहित (असि) हैं । आप उस व्यक्ति को (आपित्वम्) अपना सम्बन्धी बनाना (इच्छसे) चाहते हैं, जो कि (युधा इत्) पापों के साथ युद्ध कर के आप का सम्बन्धी बनता है ।
Footnote
[ वेदों में जीवात्मा और परमात्मा को सखा कहा है । सखा का अर्थ है “समान ख्याति वाले, समान प्रसिद्धि वाले” । परमात्मा तो सदा से शुद्ध पवित्र है । जीवात्मा भी जब योगसाधनाओं द्वारा शुद्ध-पवित्र हो जाता हैं तब जीवात्मा और परमात्मा दोनों समान ख्याति वाले हो जाते हैं, सखा बन जाते हैं, सखा-पन के रिश्ते में बन्ध जाते हैं, परस्पर सम्बन्धी हो जाते हैं । परन्तु जीवात्मा तभी परमात्मा का रिश्तेदार बनता है, जब कि वह, अपने देवासुर-संग्राम में स्वयं युद्ध कर असुरों पर विजय पा लेता है। अना = अ + ना (“नृ” का प्रथमैकवचन) ]