SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1378

1871 Mantra
Devata- आत्मा सूर्यो वा Rishi- सार्पराज्ञी Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्रि꣣ꣳश꣢꣫द्धाम꣣ वि꣡ रा꣢जति꣣ वा꣡क्प꣢त꣣ङ्गा꣡य꣢ धीयते । प्र꣢ति꣣ व꣢स्तो꣣र꣢ह꣣ द्यु꣡भिः꣢ ॥१३७८॥

त्रि꣣ꣳश꣢त् । धा꣡म꣢꣯ । वि । रा꣣जति । वा꣢क् । प꣣तङ्गा꣡य꣢ । धी꣣यते । प्र꣡ति꣢꣯ । व꣡स्तोः꣢꣯ । अ꣡ह꣢꣯ । द्यु꣡भिः꣢꣯ ॥१३७८॥

Mantra without Swara
त्रिꣳशद्धाम वि राजति वाक्पतङ्गाय धीयते । प्रति वस्तोरह द्युभिः ॥

त्रिꣳशत् । धाम । वि । राजति । वाक् । पतङ्गाय । धीयते । प्रति । वस्तोः । अह । द्युभिः ॥१३७८॥

Samveda - Mantra Number : 1378
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 3;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(वाक्) उपासक की स्तुतिवाणी, उपासक में, (त्रिशत् घाम) ३० मुहूर्तों में लगातार (वि राजति) विराजमान रहती है, और स्तुति वाणी (पतङ्गाय) जीवात्मा की शुद्धि और परमात्मा की प्राप्ति के लिये (धीयते) परिपुष्ट की जाती है । (प्रति वस्तोः) प्रतिदिन (द्युभिः अह) सूर्य की द्युति से लेकर अगले सूर्योदय तक स्तुतिवाणी उपासक में रहती है ।
Footnote
[ पतङ्ग का अर्थ है, —पक्षी । वेदों में जीवात्मा और परमात्मा को “द्वा सुपर्णा” अर्थात् दो पक्षियों के रूप में वर्णित किया है । प्रस्तुत मन्त्र में इन्हें “पतङ्ग” कहा है । जीवात्मा कभी तो शरीर में “पतन” करता है, और कभी शरीर से “गमन” अर्थात् पृथक् होता है । इसी प्रकार सृष्टिकाल में परमात्मा जगत् में “पतन” करता है, और प्रलयकाल में जगत् से “गमन” करता है, पृथक् हो जाता है । अत: जीवात्मा और परमात्मा दोनों “पतङ्ग” हैं । पतङ्ग = पतन् + ग (गच्छति) ]