SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1364

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- त्र्यरुणस्त्रैवृष्णः, त्रसदस्युः पौरुकुत्स्यः Chhand- पिपीलिकामध्या अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
प꣢र्यू꣣ षु꣡ प्र ध꣢꣯न्व꣣ वा꣡ज꣢सातये꣣ प꣡रि꣢ वृ꣣त्रा꣡णि꣢ स꣣क्ष꣡णिः꣢ । द्वि꣣ष꣢स्त꣣र꣢ध्या꣢ ऋण꣣या꣡ न꣢ ईरसे ॥१३६४॥

प꣡रि꣢꣯ । ऊ꣡ । सु꣢ । प्र । ध꣣न्व । वा꣡ज꣢꣯सातये । वा꣡ज꣢꣯ । सा꣣तये । प꣡रि꣢꣯ । वृ꣣त्रा꣡णि꣢ । स꣣क्ष꣡णिः꣢ । स꣣ । क्ष꣡णिः꣢꣯ । द्वि꣣षः꣢ । त꣣र꣡ध्यै꣢ । ऋ꣣णयाः꣢ । ऋ꣣ण । याः꣢ । नः꣢ । ईरसे ॥१३६४॥

Mantra without Swara
पर्यू षु प्र धन्व वाजसातये परि वृत्राणि सक्षणिः । द्विषस्तरध्या ऋणया न ईरसे ॥

परि । ऊ । सु । प्र । धन्व । वाजसातये । वाज । सातये । परि । वृत्राणि । सक्षणिः । स । क्षणिः । द्विषः । तरध्यै । ऋणयाः । ऋण । याः । नः । ईरसे ॥१३६४॥

Samveda - Mantra Number : 1364
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
हे परमेश्वर ! (वाजसातये) बल प्रदान के लिये, (उ) निश्चय से, आप (सु) सुगमता से (परि प्र धन्व) हमें शीघ्र प्राप्त हूजिये । (वृत्राणि) विघ्न-बाधक रूप हमारे कामादि शत्रुओं का (परि सक्षणिः) पूर्ण क्षय कीजिये । (द्विषः) द्वेष-नद से (तरध्यै) हमें तैराने के लिये, (ऋणयाः न) ॠण-यापन करने वाले, अर्थात् ऋण चुकाने वाले के सदृश (ईयसे) आप हमें प्राप्त हों ।
Footnote
[ वैदिक दृष्टि में ऋणी, अपने ऋण के चुकाने में, अत्यन्त व्याकुलरूप में वर्णित हुआ है । वह परमेश्वर से प्रार्थना करता है कि वह इहलोक तथा परलोक के ऋणों के चुकाने में समर्थ हो । वैदिक ऋणी, अपने ऋण के चुकाने के लिये, सुगमता से तथा शीघ्रता से, ऋण-दाता के समीप पहुँच कर ऋण चुकाता है । उपासक की भक्ति और श्रद्धा का ऋणी है, — परमेश्वर ! उसे भी उपासक का ऋण चुकाना है । उपासक का ऋण चुकाया जायगा, जब कि परमेश्वर उपासक को द्वेष-नद से तैराएगा, उसे अपने स्वरूप का दर्शन देगा, और उसे मोक्ष प्रदान करेगा । इस दृष्टि से परमेश्वर को ‘ऋणयाः’ कहा है ]