SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1331

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अम्बरीषो वार्षागिर ऋजिश्वा भारद्वाजश्च Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा꣢य꣣ सोम꣣ पा꣡त꣢वे वृत्र꣣घ्ने꣡ परि꣢꣯ षिच्यसे । न꣡रे꣢ च꣣ द꣡क्षि꣢णावते वी꣣रा꣡य꣢ सदना꣣स꣡दे꣢ ॥१३३१॥

इ꣡न्द्रा꣢꣯य । सो꣣म । पा꣡त꣢꣯वे । वृ꣡त्र꣢꣯घ्ने । वृ꣣त्र । घ्ने꣢ । प꣡रि꣢꣯ । सि꣡च्यसे । न꣡रे꣢꣯ । च꣣ । द꣡क्षि꣢꣯णावते । वी꣣रा꣡य꣢ । स꣣दनास꣡दे꣢ । स꣣दन । स꣡दे꣢꣯ ॥१३३१॥

Mantra without Swara
इन्द्राय सोम पातवे वृत्रघ्ने परि षिच्यसे । नरे च दक्षिणावते वीराय सदनासदे ॥

इन्द्राय । सोम । पातवे । वृत्रघ्ने । वृत्र । घ्ने । परि । सिच्यसे । नरे । च । दक्षिणावते । वीराय । सदनासदे । सदन । सदे ॥१३३१॥

Samveda - Mantra Number : 1331
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 11;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(सोम) हे सौम्य उपासक ! (पातवे) रक्षा के लिये तू (इन्द्राय) परमेश्वर के प्रति (परिषिच्यसे) पूर्णरूप में न्यौछावर कर दिया गया है, उस परमेश्वर के प्रति जो कि (वृत्रघ्ने) तेरे पाप वृत्रों की हत्या करता है, (नरे) जगत् का नेता है, (दक्षिणावते) जिस ने समग्र पदार्थ मानो दक्षिणारूप में दे रखे हैं, (वीराय) जो सर्वप्रेरक है, (सदनासदे) और जो तेरे हृदय-सदन में विराज रहा है ।
Footnote
[ वीराय = वि + ईर् (गतौ) । नरे = नृ नये । सदनासदे = सदनासद्—चतुर्थ्येक वचने ]