SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1319

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
श्रा꣡य꣢न्त इव꣣ सू꣢र्यं꣣ वि꣡श्वेदिन्द्र꣢꣯स्य भक्षत । व꣡सू꣢नि जा꣣तो꣡ जनि꣢꣯मा꣣न्यो꣡ज꣢सा꣣ प्र꣡ति꣢ भा꣣गं꣡ न दी꣢꣯धिमः ॥१३१९॥

श्रा꣡य꣢꣯न्तः । इ꣣व । सू꣡र्य꣢꣯म् । वि꣡श्वा꣢꣯ । इत् । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । भ꣣क्षत । व꣡सू꣢꣯नि । जा꣣तः꣢ । ज꣡नि꣢꣯मानि । ओ꣡ज꣢꣯सा । प्र꣡ति꣢꣯ । भा꣣ग꣢म् । न । दी꣣धिमः ॥१३१९॥

Mantra without Swara
श्रायन्त इव सूर्यं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत । वसूनि जातो जनिमान्योजसा प्रति भागं न दीधिमः ॥

श्रायन्तः । इव । सूर्यम् । विश्वा । इत् । इन्द्रस्य । भक्षत । वसूनि । जातः । जनिमानि । ओजसा । प्रति । भागम् । न । दीधिमः ॥१३१९॥

Samveda - Mantra Number : 1319
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 10;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(सूर्यम् इव) सूर्य सदृश स्वप्रकाशी तथा अन्यों को प्रकाश देने वाले परमेश्वर के (श्रायन्तः) आश्रय में रहते हुए तुम सब, (इन्द्रस्य) परमेश्वर की दी हुई (जाता उ) वर्तमान तथा (जनिमानि) उत्पन्न होने वाली (विश्वा वसूनि) सब प्रकार की सम्पत्तियों का (भक्षत) भोग करो, (ओजसा) परिश्रम करते हुए तथा (न) जैसे हम पितृप्रदत्त (प्रति भागम्) सम्पत्ति के अपने-अपने हिस्से को (दीधिम) धारण करते हैं, वैसे जगत् के पिता द्वारा प्रदत्त सम्पत्तियों को यथोचित्त बाँट कर हम धारण करें ।
Footnote
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