SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1306

1871 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वं꣡ वरु꣢꣯ण उ꣣त꣢ मि꣣त्रो꣡ अ꣢ग्ने꣣ त्वां꣡ व꣢र्धन्ति म꣣ति꣢भि꣣र्व꣡सि꣢ष्ठाः । त्वे꣡ वसु꣢꣯ सुषण꣣ना꣡नि꣢ सन्तु यू꣣यं꣡ पा꣢त स्व꣣स्ति꣢भिः꣣ स꣡दा꣢ नः ॥१३०६॥

त्वम् । व꣡रु꣢꣯णः । उ꣣त꣢ । मि꣣त्रः꣢ । मि꣣ । त्रः꣢ । अ꣣ग्ने । त्वा꣢म् । व꣣र्धन्ति । मति꣡भिः꣢ । व꣡सि꣢꣯ष्ठाः । त्वे꣢꣯ । इ꣢ति । व꣡सु꣢꣯ । सु꣣षणना꣡नि꣢ । सु꣣ । सनना꣡नि꣢ । स꣣न्तु । यूय꣢म् । पा꣣त । स्वस्ति꣡भिः꣢ । सु꣣ । अस्ति꣡भिः꣢ । स꣡दा꣢꣯ । नः ॥१३०६॥

Mantra without Swara
त्वं वरुण उत मित्रो अग्ने त्वां वर्धन्ति मतिभिर्वसिष्ठाः । त्वे वसु सुषणनानि सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥

त्वम् । वरुणः । उत । मित्रः । मि । त्रः । अग्ने । त्वाम् । वर्धन्ति । मतिभिः । वसिष्ठाः । त्वे । इति । वसु । सुषणनानि । सु । सननानि । सन्तु । यूयम् । पात । स्वस्तिभिः । सु । अस्तिभिः । सदा । नः ॥१३०६॥

Samveda - Mantra Number : 1306
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 8;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) हे प्रकाशस्वरूप सर्वाग्रणी ! (त्वम्) आप ही (वरुणः) वरुण हैं, (उत) और (मित्रः) आप ही मित्र हैं। (वसिष्ठाः) प्राणाभ्यासी उपासक (मतिभिः) मनन निदिध्यासन द्वारा (त्वाम्) आप के प्रकाश को (वर्धन्ति) अधिकाधिक रूप में बढ़ाते हैं । (त्वे) आप में (वसु) जो वसु विद्यमान हैं वे (सुषणनानि) हमें उत्तम सुखदायी (सन्तु) हों । (यूयम्) हे तीनरूपों में वर्तमान परमेश्वर ! आप उन तीनों (स्वस्तिभिः) कल्याणमय रूपों द्वारा (नः सदा पात) हमारी सदा रक्षा कीजिये, या हे आध्यात्मिक सम्पत्ति सम्पन्न गुरुजनो ! (मन्त्र १३०५ में मधोनः) आप कल्याणमार्गों द्वारा हम उपासकों की सदा रक्षा कीजिये ।
Footnote
[ मन्त्र में परमेश्वर को “अग्ने” पद द्वारा सम्बोधित कर के, उसे ही वरुण तथा मित्र कहा है । इसी लिये मन्त्र के द्वितीय पाद में “त्वाम्” इस एकवचनपद का प्रयोग हुआ है । अतः “वरुण, मित्र, तथा अग्नि” पर्यायवाची प्रतीत होते हैं । वरुण का अर्थ है वरण करने वाला । मित्र का अर्थ है मित्रवत् हितकारी और स्नेह करने वाला । मन्त्र के चतुर्थ पाद में “यूयम्” इस बहुवचन द्वारा, गुणभेद से व्यक्तिभेद मान कर, एक ही परमेश्वर का वर्णन हुआ है। जैसे एक ही व्यक्ति सम्बन्धभेद से पति, पिता, चाचा, मामा, भाई आदि शब्दों का वाच्य होता है ]