SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1304

1871 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ꣡ग꣢न्म म꣣हा꣡ नम꣢꣯सा꣣ य꣡वि꣢ष्ठं꣣ यो꣢ दी꣣दा꣢य꣣ स꣡मि꣢द्धः꣣ स्वे꣡ दु꣢रो꣣णे꣢ । चि꣣त्र꣡भा꣢नु꣣ꣳ रो꣡द꣢सी अ꣣न्त꣢रु꣣र्वी꣡ स्वा꣢हुतं वि꣣श्व꣡तः꣢ प्र꣣त्य꣡ञ्च꣢म् ॥१३०४॥

अ꣡ग꣢꣯न्म । म꣣हा꣢ । न꣡म꣢꣯सा । य꣡वि꣢꣯ष्ठम् । यः । दी꣣दा꣡य꣢ । स꣡मि꣢꣯द्धः । सम् । इ꣣द्धः । स्वे꣢ । दु꣣रोणे꣢ । दुः꣣ । ओने꣢ । चि꣣त्र꣡भा꣢नुम् । चि꣣त्र꣢ । भा꣣नुम् । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । अ꣣न्तः꣢ । उ꣣र्वी꣡इति꣢ । स्वा꣡हु꣢तम् । सु । आ꣣हुतम् । वि꣡श्व꣢तः । प्र꣣त्य꣡ञ्च꣢म् । प्र꣣ति । अ꣡ञ्च꣢꣯म् ॥१३०४॥

Mantra without Swara
अगन्म महा नमसा यविष्ठं यो दीदाय समिद्धः स्वे दुरोणे । चित्रभानुꣳ रोदसी अन्तरुर्वी स्वाहुतं विश्वतः प्रत्यञ्चम् ॥

अगन्म । महा । नमसा । यविष्ठम् । यः । दीदाय । समिद्धः । सम् । इद्धः । स्वे । दुरोणे । दुः । ओने । चित्रभानुम् । चित्र । भानुम् । रोदसीइति । अन्तः । उर्वीइति । स्वाहुतम् । सु । आहुतम् । विश्वतः । प्रत्यञ्चम् । प्रति । अञ्चम् ॥१३०४॥

Samveda - Mantra Number : 1304
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 8;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(यः) जो परमेश्वर (स्वे) अपने प्रकट होने के स्थान अर्थात् (दुरोणे) हृदय गृह में (समिद्यः) सम्यक् प्रदीप्त हो कर (दीदाय) प्रकाशित होता है, उस (यविष्ठम्) सदा युवा शक्ति वाले, (उर्वी) विस्तृत (रोदसी) पृथिवी लोक और द्युलोक के (अन्तः) भीतर (चित्रभानुम्) अद्भुत प्रभा वाले, (स्वाहुतम्) उत्तम प्रकार से जीवात्मरूप अग्नियों में आहुति रूप में प्राप्त, (विश्वतः) सब ओर (प्रत्यञ्चम्) प्रत्येक पदार्थ में व्याप्त परमेश्वर को, — (महा नमसा) भूमिष्ठ नमः—शक्तियों द्वारा, महानम्रता द्वारा (अगन्म) हम प्राप्त हुए हैं ।
Footnote
[ स्वाहुतम् = सु + आहुतम् । इस सम्बन्ध में यजुर्वेद (३१। १४) का मन्त्र महत्त्व का है । यथाः—“यत्पुरुषेण हविषा देवाः यज्ञमतन्वत। वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इष्मः शरद्धविः” । अभिप्राय यह है कि उपासक देव, पुरुष अर्थात् जगत्पुरी में बसे हुए परमेश्वर रूपी हवि द्वारा, जब परमेश्वर का ध्यान-यज्ञ करते हैं, उस ध्यानयज्ञ में वसन्त ऋतु आज्यरूप होती है, ग्रीष्म ऋतु इष्म, तथा शरद् ऋतु हवि होती है । मन्त्र में “पुरुषेण हविषा” द्वारा परमेश्वर को हवि कहा है । हवि डाली जाती है अग्नि में । परमेश्वर के ध्यान में परमेश्वर को हवि माना है, और जीवात्मा को अग्नि कहा है । प्रभु-दर्शन की उग्र अभिलाषा से सम्पन्न जीवात्मा अग्नि है। इस जीवात्मरूपी अग्नि में, ध्यानरूपी हस्त द्वारा, परमेश्वर की हवि आहुत करनी होती है । ध्यानाभ्यास द्वारा किसी सौभाग्य काल में परमेश्वर का प्रकाश प्रकट होने लगता है। हवि की आहुति जब प्रज्वलित अग्नि में दी जाती है तब हवि से प्रकाश निकलता है, हवि प्रकाशमय हो जाती है। इसी प्रकार परमेश्वर जब “स्वाहुत” हो जाता है, उत्तम प्रकार से आहुत हो जाता है, तब इस परमेश्वरीय हवि से प्रकाश प्रकट होता है, अर्थात् परमेश्वर प्रकट होता है। परमेश्वरीय प्रकाशरूपी अग्नि में, फिर वर्षभर आत्माहुति देनी चाहिये । इसे तीन ऋतुओं द्वारा दर्शाया हैं । वसन्त ही आज्य है, ग्रीष्म ही इध्म, तथा शरद् हविरूप है । इस प्रकार मन्त्र में दो हवियों का वर्णन हुआ है, एक परमेश्वर रूपी हवि का और दूसरी शरद् रूपी हवि का । परमेश्वराग्नि के साक्षात् प्रकट हो जाने पर, इस प्रत्यक्ष अग्नि में, वर्षभर लगातार आत्मसमर्पण करना होता है । आत्म समर्पण में अन्तिम आहुति शरद् हवि की होती है, और ध्याता एक वर्ष में अपने ध्यानयज्ञ में परमेश्वर का साक्षात् कर कृतकृत्य हो जाता है ।
[ दरोणे = गृहनाम (निघं० ३। ४) ]