SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1298

1871 Mantra
Devata- पवमानाध्येता Rishi- पवित्र आङ्गिरसो वा वसिष्ठो वा उभौ वा Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यः꣡ पा꣢वमा꣣नी꣢र꣣ध्ये꣡त्यृषि꣢꣯भिः꣣ स꣡म्भृ꣢त꣣ꣳ र꣡स꣢म् । स꣢र्व꣣ꣳ स꣢ पू꣣त꣡म꣢श्नाति स्वदि꣣तं꣡ मा꣢त꣣रि꣡श्व꣢ना ॥१२९८॥

यः꣢ । पा꣣वमानीः꣢ । अ꣣ध्ये꣡ति꣢ । अ꣣धि । ए꣡ति꣢꣯ । ऋ꣡षि꣢꣯भिः । सं꣡भृ꣢꣯तम् । सम् । भृ꣣तम् । र꣡स꣢꣯म् । स꣡र्व꣢꣯म् । सः । पू꣣त꣢म् । अ꣣श्नाति । स्वदित꣢म् । मा꣣तरि꣡श्व꣢ना ॥१२९८॥

Mantra without Swara
यः पावमानीरध्येत्यृषिभिः सम्भृतꣳ रसम् । सर्वꣳ स पूतमश्नाति स्वदितं मातरिश्वना ॥

यः । पावमानीः । अध्येति । अधि । एति । ऋषिभिः । संभृतम् । सम् । भृतम् । रसम् । सर्वम् । सः । पूतम् । अश्नाति । स्वदितम् । मातरिश्वना ॥१२९८॥

Samveda - Mantra Number : 1298
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 10; Khand » 7;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(यः) जो व्यक्ति (ऋषिभिः) ऋषिकोटि के गुरुओं द्वारा, (पावमानीः) पवित्र करने वाली ऋचाओं का (अध्येति) अध्ययन करता है, जो पवित्र करने वाली ऋचाएं जीवनोपयोगी (रसम्) ज्ञान रस के (संभृतम्) संग्रहरूप हैं, (सः) वह व्यक्ति, (मातरिश्वना) वायु द्वारा (स्वदितम्) आस्वादन किये गये, और इसलिये (पूतम्) पवित्र हुए, (सर्वम्) सब प्रकार के भोज्य पदार्थों का (अश्नाति) भोजन करता है ।
Footnote
[ वेदों की ऋचाएँ जीवन को पवित्र करने के उपायों का वर्णन करती हैं । इन का अध्ययन ऋषिकोटि के गुरुओं द्वारा करना चाहिये । सामान्य गुरु ऋचाओं के रहस्यार्थों पर प्रकाश नहीं डाल सकते । ऋचाओं में जीवनोपयोगी ज्ञान-रस का वर्णन भरा पड़ा है । ऋचाएँ उपदेश देती हैं कि जिस अन्न को खाओ प्रथम परमेश्वर के नाम पर उस अन्न की आहुति, अग्निहोत्र द्वारा तथा वैश्वदेव यज्ञ द्वारा, वायु में पहुँचाओ । इस प्रकार पवित्र हुए अन्न का भोजन तदनन्तर करो । इस भाव की परिपुष्टि में निम्न प्रमाणों को ध्यान में रखना चाहिये, यथाः—“यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्व-किल्विषात्”; भुञ्जते ते त्वघं पापाः ये पचन्त्यात्म-कारणात्” (गीता); “केवलाघो भवति केवलादी” (वेद) ]