SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1250

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- जेता माधुच्छन्दसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
पु꣣रां꣢ भि꣣न्दु꣡र्युवा꣢꣯ क꣣वि꣡रमि꣢꣯तौजा अजायत । इ꣢न्द्रो꣣ वि꣡श्व꣢स्य꣣ क꣡र्म꣢णो ध꣣र्त्ता꣢ व꣣ज्री꣡ पु꣢रुष्टु꣣तः꣢ ॥१२५०॥

पु꣣रा꣢म् । भि꣣न्दुः꣢ । यु꣡वा꣢꣯ । क꣣विः꣢ । अ꣡मि꣢꣯तौजाः । अ꣡मि꣢꣯त । ओ꣣जाः । अजायत । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । वि꣡श्व꣢꣯स्य । क꣡र्म꣢꣯णः । ध꣣र्त्ता꣢ । व꣣ज्री꣢ । पु꣣रुष्टुतः꣢ । पु꣣रु । स्तुतः꣢ ॥१२५०॥

Mantra without Swara
पुरां भिन्दुर्युवा कविरमितौजा अजायत । इन्द्रो विश्वस्य कर्मणो धर्त्ता वज्री पुरुष्टुतः ॥

पुराम् । भिन्दुः । युवा । कविः । अमितौजाः । अमित । ओजाः । अजायत । इन्द्रः । विश्वस्य । कर्मणः । धर्त्ता । वज्री । पुरुष्टुतः । पुरु । स्तुतः ॥१२५०॥

Samveda - Mantra Number : 1250
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 9;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्रः) परमेश्वर (अजायत) मुझ उपासक में प्रकट हुआ है । वह (पुरां भिन्दुः) स्थूल शरीरों का भेदन करता, मृत्यु द्वारा उन्हें विनष्ट करता है, (युवा) शक्तियों की दृष्टि से सदा युवा, उत्पत्ति और विनाश के लिये तत्त्वों में परस्पर संयोग और विभाग का करने वाला, (कविः) वेदकाव्यों का कवि अर्थात् रचयिता, (अमितौजाः) अपरिमित बल वाला, (विश्वस्य कर्मणः) संसार की विविध कृतियों का (धर्त्ता) करने वाला और उन का धारण-पोषण करने वाला, (वज्री) आसुर भावों पर वज्र-प्रहार करने वाला, तथा (पुरुष्टुतः) वेदों में बहुत प्रकार से प्रशंसित है ।
Footnote
[ मन्त्र १२४६ में “पुराम्” शब्द द्वारा सूक्ष्म तथा कारण शरीरों का वर्णन है, जो कि मृत्यु के पश्चात् भी जीवात्मा के साथ रहते और भावी जन्मों के बीज रूप होते हैं । और मन्त्र १२५० में “पुराम्” द्वारा स्थूल शरीरों का वर्णन हुआ है, जिन की कि उत्पत्ति और विनाश होता रहता है। इन्हीं “पुरों” की दृष्टि से जीवात्मा को “पुरुष” कहते हैं । पुरुष का अर्थ है पुरी में बसने वाला । शरीर ही जीवात्मा की पुरी है । युवा—यु (मिश्रण और अमिश्रण) ]