SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1225

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- उचथ्य आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡ध्व꣢र्यो꣣ अ꣡द्रि꣢भिः सु꣣त꣡ꣳ सोमं꣢꣯ प꣣वि꣢त्र꣣ आ꣡ न꣢य । पु꣣नाही꣡न्द्रा꣢य꣣ पा꣡त꣢वे ॥१२२५॥

अ꣡य्व꣢꣯र्यो । अ꣡द्रि꣢꣯भिः । अ । द्रि꣣भिः । सुत꣢म् । सो꣡म꣢꣯म् । प꣣वि꣡त्रे꣢ । आ । नय꣣ । पुनाहि꣢ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । पा꣡त꣢꣯वे ॥१२२५॥

Mantra without Swara
अध्वर्यो अद्रिभिः सुतꣳ सोमं पवित्र आ नय । पुनाहीन्द्राय पातवे ॥

अय्वर्यो । अद्रिभिः । अ । द्रिभिः । सुतम् । सोमम् । पवित्रे । आ । नय । पुनाहि । इन्द्राय । पातवे ॥१२२५॥

Samveda - Mantra Number : 1225
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 7;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(अध्वर्यो) हिंसामय उपासना-यज्ञ के हे यजमान ! तू (अद्रिभिः) आदरणीय तथा उपासना-विधियों के ज्ञाता गुरुओं की सहायता से, (सुतं सोमम्) उत्पादित भक्तिरस को, (पवित्रे) अपने पवित्र हृदय में (आ नय) प्रकट कर, (पुनाहि) और उस भक्तिरस को पवित्र कर, ताकि (इन्द्राय दातवे) वह परमेश्वर द्वारा स्वीकृत हो जाय ।
Footnote
[ अध्वर्यो = अ + ध्वर् (हिंसा) + यु । अद्रिभिः = अद्रयः आदरणीयाः (निरु० ९। १। ६) । विद्वांसो हि ग्रावाणः (शत० ३। ९। ३। ४) । पुनाहि = बिना फलेच्छा के भक्तिरस का समर्पण, — यह भावना, भक्तिरस को पवित्र करती है । पातवे = पान करना या पीना, इस का अभिप्राय है स्वीकार करना । “पा” धातु केवल मुख द्वारा तरल पदार्थ के पीने में ही प्रयुक्त नहीं होती । इस का प्रयोग निम्न प्रकार भी होता है, यथाः—To drink in with the eyes or ears, Look at or listen to intently (आपटे) । पातवे का अर्थ “रक्षा के लिये”—भी होता है, ताकि परमेश्वर तेरे भक्तिरस की रक्षा करे ]