SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1203

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡ प꣢वमान धारया र꣣यि꣢ꣳ स꣣ह꣡स्र꣢वर्चसम् । अ꣣स्मे꣡ इ꣢न्दो स्वा꣣भु꣡व꣢म् ॥१२०३॥

आ । प꣣वमान । धारय । र꣢यिम् । स꣣ह꣡स्र꣢वर्चसम् । स꣣ह꣡स्र꣢ । व꣣र्च꣡सम् । अस्मे꣡इति꣢ । इ꣣न्दो । स्वाभु꣡व꣢म् । सु꣣ । आभु꣡व꣢म् ॥१२०३॥

Mantra without Swara
आ पवमान धारया रयिꣳ सहस्रवर्चसम् । अस्मे इन्दो स्वाभुवम् ॥

आ । पवमान । धारय । रयिम् । सहस्रवर्चसम् । सहस्र । वर्चसम् । अस्मेइति । इन्दो । स्वाभुवम् । सु । आभुवम् ॥१२०३॥

Samveda - Mantra Number : 1203
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 3;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(पवमान) हे पवित्र करने वाले (इन्दो) प्रकाशमय प्रभो ! आप (अस्मे) हमें (रयिम्) वह आध्यात्मिक-धन (आ धारय) प्रदान कीजिये, हम में स्थिर रूप में स्थापित कीजिये, जोकि (सहस्रवर्चसम्) हजारों दीप्तियों वाला है, और (स्वाभुवम्) स्व-स्थिति वाला है, जो किसी अन्य साधन की अपेक्षा नहीं रखता।
Footnote
[ रयिम् = निर्दिष्ट “रयि” ऋतम्भरा प्रज्ञारूप, विवेकज ज्ञानरूप, तथा तारक ज्ञानरूप है । ऋतम्भरा प्रज्ञा (योग १। ४८) । ऋत का अर्थ है “सत्य”; और “भरा” का अर्थ है, “धारण करने वाली”। यह प्रज्ञा सत्य ही को धारण करती हैं, इसमें भ्रान्ति अर्थात् विपरीतज्ञान का लेशमात्र भी नहीं होता । ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा सूक्ष्म, व्यवहित, विप्रकृष्ट और अतीन्द्रिय विषयों का प्रत्यक्षज्ञान हो जाता है । ]
विवेकजज्ञान (योग ३। ४९) । इसमें सर्व भावाधिष्ठातृत्व तथा सर्वज्ञातृत्व की शक्ति प्राप्त हो जाती है ।
तारकज्ञान (योग ३। ५४) । इस में सब प्रकार के विषयों का ज्ञान, विषयों के स्थूल सूक्ष्म आदि प्रत्येक भेद का ज्ञान, तथा क्रम की अपेक्षा के बिना एक क्षण में ही सब प्रकार के विषयों का ज्ञान हो जाता है ।
इस सम्बन्ध में “तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्थानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम्” (योग ४। ३१) सूत्र भी विचारणीय है ।
[ स्वाभुवम् = इन्द्रिय-साधनों के बिना भी ऐन्द्रियक ज्ञानों का हो जाना, (योग ३। ४८; तथा ३। ३६) ]