SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1194

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
जु꣢ष्ट꣣ इ꣡न्द्रा꣢य मत्स꣣रः꣡ पव꣢꣯मानः꣣ क꣡नि꣢क्रदत् । वि꣢श्वा꣣ अ꣢प꣣ द्वि꣡षो꣢ जहि ॥११९४॥

जु꣡ष्टः꣢꣯ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । म꣣त्सरः꣡ । प꣡व꣢꣯मानः । क꣡निक्रदत् । वि꣡श्वाः꣢꣯ । अ꣡प꣢꣯ । द्वि꣡षः꣢꣯ । ज꣣हि ॥११९४॥

Mantra without Swara
जुष्ट इन्द्राय मत्सरः पवमानः कनिक्रदत् । विश्वा अप द्विषो जहि ॥

जुष्टः । इन्द्राय । मत्सरः । पवमानः । कनिक्रदत् । विश्वाः । अप । द्विषः । जहि ॥११९४॥

Samveda - Mantra Number : 1194
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(जुष्टः) प्रजाजनों द्वारा प्रीतिपूर्वक सेवित, (इन्द्राय) परमेश्वर के लिये (मत्सरः) प्रसन्नता का मानो सरोवर, (पवमानः) प्रजाजनों को सदुपदेशों द्वारा पवित्र करता हुआ उपासक (कनिक्रदत्) उन्हें बार-बार उपदेश करता है । प्रजाजन ऐसे उपासक के प्रति कहते हैं कि आप सदुपदेशों द्वारा हमारे (विश्वाः) समग्र (द्विषः) द्वेष, राग, काम, क्रोध आदि शत्रुओं का (अप जहि) विनाश कर दीजिये ।
Footnote
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