SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1157

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- पर्वतनारदौ काण्वौ शिखण्डिन्यावप्सरसौ काश्यपौ वा Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
स꣡खा꣢य꣣ आ꣡ नि षी꣢꣯दत पुना꣣ना꣢य꣣ प्र꣡गा꣢यत । शि꣢शुं꣣ न꣢ य꣣ज्ञैः꣡ परि꣢꣯ भूषत श्रि꣣ये꣢ ॥११५७॥

स꣡खा꣣यः । स । खा꣣यः । आ꣢ । नि । सी꣣दत । पुनाना꣡य꣢ । प्र । गा꣣यत । शि꣡श꣢꣯म् । न । य꣣ज्ञैः꣢ । प꣡रि꣢꣯ । भू꣣षत । श्रिये꣢ ॥११५७॥

Mantra without Swara
सखाय आ नि षीदत पुनानाय प्रगायत । शिशुं न यज्ञैः परि भूषत श्रिये ॥

सखायः । स । खायः । आ । नि । सीदत । पुनानाय । प्र । गायत । शिशम् । न । यज्ञैः । परि । भूषत । श्रिये ॥११५७॥

Samveda - Mantra Number : 1157
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 5;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(सखायः) हे उपासक मित्रो ! (आ निषीदत) उपासनायज्ञ में आइये और बैठिये, (पुनानाय) पवित्र करने वाले परमेश्वर के निमित्त (प्रगायत) सुन्दर सामगान कीजिये । (श्रिये) परमेश्वर की शोभा बढ़ाने के लिये (यज्ञैः) उपासना-यज्ञों द्वारा इसे (परि भूषत) सब प्रकार से सत्कृत कीजिये, इस की प्रशंसा कीजिये, (न) जैसे कि (शिशुम्) नवजात बच्चे की प्रशंसा की जाती है ।
Footnote
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