SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1138

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣢ म꣣न्द्र꣡मा वरे꣢꣯ण्य꣣मा꣢꣫ विप्र꣣मा꣡ म꣢नी꣣षि꣡ण꣢म् । पा꣢न्त꣣मा꣡ पु꣢रु꣣स्पृ꣡ह꣢म् ॥११३८॥

आ । म꣣न्द्र꣢म् । आ । व꣡रे꣢꣯ण्यम् । आ । वि꣡प्र꣢꣯म् । वि । प्र꣣म् । आ꣢ । म꣣नीषि꣡ण꣢म् । पा꣡न्त꣢꣯म् । आ । पु꣣रुस्पृ꣡ह꣢म् । पु꣣रु । स्पृ꣡ह꣢꣯म् ॥११३८॥

Mantra without Swara
आ मन्द्रमा वरेण्यमा विप्रमा मनीषिणम् । पान्तमा पुरुस्पृहम् ॥

आ । मन्द्रम् । आ । वरेण्यम् । आ । विप्रम् । वि । प्रम् । आ । मनीषिणम् । पान्तम् । आ । पुरुस्पृहम् । पुरु । स्पृहम् ॥११३८॥

Samveda - Mantra Number : 1138
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
हे परमेश्वर ! (मन्द्रम्) आाप आनन्द स्वरूप को (आ) हम चाहते हैं, (वरेण्यम्) वरण करने योग्य आप को (आ) हम चाहते हैं, (विप्रम्) मेधावी तथा सर्वत्र परिपूर्ण आप को (आ) हम चाहते हैं, (मनीषिणम्) मनस्वी आप को (आ) हम चाहते हैं, (पान्तम्) आप रक्षक को (आ) हम चाहते हैं, (पुरुस्पृहम्) बहुत अभीक्षित आप को (आ) हम चाहते हैं ।
Footnote
[ मन्त्र ११३७ से “वृणीमहे” की अनुवृत्ति होती है । उपासक की सर्वोच्च कामना का वर्णन हुआ है । वह केवल प्रभुदर्शन ही चाहता है । [ आ = आ वृणीमहे ]