SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1129

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣢꣫ धारा꣣ म꣡धो꣢ अग्रि꣣यो꣢ म꣣ही꣢र꣣पो꣡ वि गा꣢꣯हते । ह꣣वि꣢र्ह꣣विः꣢षु꣣ व꣡न्द्यः꣢ ॥११२९॥

प्र । धा꣡रा꣢꣯ । म꣡धोः꣢꣯ । अ꣣ग्रियः꣢ । म꣣हीः꣢ । अ꣣पः꣢ । वि । गा꣣हते । हविः꣢ । ह꣣वि꣡ष्षु꣢ । व꣡न्द्यः꣢꣯ ॥११२९॥

Mantra without Swara
प्र धारा मधो अग्रियो महीरपो वि गाहते । हविर्हविःषु वन्द्यः ॥

प्र । धारा । मधोः । अग्रियः । महीः । अपः । वि । गाहते । हविः । हविष्षु । वन्द्यः ॥११२९॥

Samveda - Mantra Number : 1129
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(अग्नियः) सर्वश्रेष्ठ सर्वाग्रणी परमेश्वर (मधोः) मधुर भक्तिरस की (मही) विशाल (धाराः अपः) धाराओं के जलों में (प्र विगाहते) खूब स्नान करता है, मानो डुबकियां लगाता है । (हविःषु) हमारी आत्म-समर्पणरूपी हवियों में (वन्द्यः) वही वन्दनीय है । (हविः) वह स्वयं हविरूप है ।
Footnote
[ हविः = इस सम्बन्ध में निम्नलिखित मन्त्र प्रकाश डालता है । यथाः—यत्पुरुषेण हविषा देवाः यज्ञमतन्वत । वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ॥ (यजु० ३१। १४) । अभिप्राय यह कि ध्यान में प्रथम परमेश्वरीय भावनाओं को, और उस के स्वरूप को, जीवात्माग्नि में आहुत करना चाहिये । इस प्रक्रिया में परमेश्वर हविरूप है, और जीवात्मा अग्निरूप । ध्यानाभ्यास के प्रकर्ष से परमेश्वर रूपी हवि जब चमक उठती है, जैसे कि प्राकृतिक हवि को यज्ञियाग्नि में डालने से प्राकृतिक हवि चमक उठती है, तब परमात्मरूपी हवि अग्नि का रूप धारण कर लेती है, तब इस अग्नि के प्रति तीन ऋतुमय वर्ष, पूर्णरूप से लगा देना चाहिये, और इस अग्नि के प्रति वर्षकाल तथा अपने आप को, तथा अपनी समग्र शक्तियों को समर्पित कर देना चाहिये । इस प्रकार के उपासना-यज्ञ में एक बार तो परमेश्वर “हवि” बनता है और जीवात्मा अग्नि होता है । और दूसरी बार जीवात्मा और उस की शक्तियां “हवि” बनती हैं, और परमेश्वर अग्नि होता हैं । इस दृष्टि से मन्त्र में परमेश्वर को “हवि” कहा है ]