SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1126

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ना꣢भा꣣ ना꣡भिं꣢ न꣣ आ꣡ द꣢दे꣣ च꣡क्षु꣢षा꣣ सू꣡र्यं꣢ दृ꣣शे꣢ । क꣣वे꣡रप꣢꣯त्य꣣मा꣡ दु꣢हे ॥११२६॥

ना꣡भा꣢꣯ । ना꣡भि꣢꣯म् । नः꣣ । आ꣢ । द꣣दे । च꣡क्षु꣢꣯षा । सू꣡र्य꣢꣯म् । दृ꣡शे꣢ । क꣣वेः꣢ । अ꣡प꣢꣯त्यम् । आ । दु꣣हे ॥११२६॥

Mantra without Swara
नाभा नाभिं न आ ददे चक्षुषा सूर्यं दृशे । कवेरपत्यमा दुहे ॥

नाभा । नाभिम् । नः । आ । ददे । चक्षुषा । सूर्यम् । दृशे । कवेः । अपत्यम् । आ । दुहे ॥११२६॥

Samveda - Mantra Number : 1126
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 1;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
मैं उपासक (नाभा) अपनी नाभि में, (नः नाभिम्) हम सब की नाभि परमेश्वर का (आ ददे) आधान करता हूँ, ताकि मैं (चक्षुषा) दिव्य दृष्टि पा कर (सूर्यम्) सूर्यों के सूर्य परमेश्वर का (दृशे) दर्शन पा सकूं । (कवेः) वेद-काव्यों के कवि से (अपत्यम्) न पतन होने का (आ दुहे) मैं वर मांगता हूँ, अथवा मुझे अपना सच्चा पुत्र बनाले—- यह वर मैं मांगता हूँ ।
Footnote
[ नाभा नाभिमः—योग दर्शन में नाभि में संयम का भी विधान है । यथा “नाभि चक्रे कायव्यूहूज्ञानम्” (३। २६) । अर्थात् नाभिचक्र में संयम द्वारा शरीर की समग्र रचना का ज्ञान हो जाता है। बच्चा जब मातृगर्भ में होता है तब उसका पालन-पोषण नाभि द्वारा ही हो रहा होता है, और इसी नाभिरूपी केन्द्र से बच्चे के समग्र शरीर में पोषण-तत्त्व पहुंच रहा होता है । अतः नाभि का सम्बन्ध शरीर के सभी अङ्ग-प्रत्यङ्गों के साथ है। इस नाभि-संयम द्वारा योगी को जब शरीर रचना का पूर्णज्ञान हो जाता है, तब वह ऊपर के चक्रों में भी संयम करने लगता है । ऊपर के चक्र अर्थात् हृदय-चक्र, विशुद्ध चक्र आदि में से होता हुआ योगी आज्ञा-चक्र में जब संयम करता है, तब इसका तृतीय नेत्र खुल जाता है। इस तृतीय नेत्र को मन्त्र में “चक्षुषा” शब्द द्वारा निर्दिष्ट किया है । मन्त्र में परमेश्वर को “नाभि” कहा है। वह गजत् की नाभि है, गजद् योनि है । उसी द्वारा जगत् का पालन-पोषण हो रहा है ]